अवधूत उपनिषद Part 2

।। श्रीविद्या अंतर्गत उपनिषदों का अभ्यास ।।
¶ अवधूत उपनिषद पार्ट २ ¶

ॐ नमस्ते मित्रो ,
श्रीविद्या संजीवन साधना सेवा पीठम , ठाणे में आपका स्वागत हैं।

पिछले लेख में आपने अवधूत उपनिषद का प्रथम श्लोक देखा कि कैसे मुनि सांकृति ने दत्तात्रेय जी से अवधूत विषय पर प्रश्न पूछा है।

उसीमें से आज हम तीन शब्दो की व्याख्या समझेंगे।

” तत्वमसि ” ” अक्षरतत्व ” जानने वाला और “सांसारिक जीवन” से परे कहा है , वह क्या है?

१) तत्वमसि शब्द वैसे तो अद्वैतवाद और श्रीविद्या साधना में पंचदशी दीक्षा में उसका तत्व समझया जाता हैं।

तत्व वही है , जो शिव विष्णु ब्रम्हा में चलता है, वही है जो मनुष्यो में भी चलता है पर उसकी पहचान मनुष्य को नहीं होती। तत्त्वमसि, अर्थात “वह तू है “। देखिए शब्द में जोर है ” वह ” पर, ताकि तू मिट सके। तू को मिटाना है। जितना तू गलेगा, जितना तू मिटेगा, उतना वह विराट होगा, प्रगट होगा। तू को हटाना है, ताकि उसे निर्बाध जाना जा सके। साधना में खुदको मिटाना होता हैं , अहंकार मन्दबुद्धित्व अज्ञान ई गुरु के पास बैठकर उसे हटाना है। शक्तियां परीक्षा लेंगी , धन खिंचेगी , सुख खिंचेगी अथवा देखेंगी की आप अपने शख्सीयत नाम पैसा रुतबा मिटाने के लिए तैयार हो? यह सब सोलाह श्रीयंत्र , देवी के फ़ोटो , ध्यान में हिलने डुलने से , भजन कीर्तनों से नहीं होता। उलटा अद्वैत में इन सब चीजों की जरूरत ही नहीं। गुरु की उत्तम संगति चाहिए। गुरु भी ऐसा हो की जो फकीर हो , तुमारा तुम जब मिटेगा तब जाकर कही तुम्हारे अंदर छुपे मूल तुम की पहचान होगी। मायावादी गुरु की तत्व शब्द का त तक भी पता नहीं होता। क्योंकि , ऐसे गुरु आपको अलग अलग शिविरों में , संस्थाका नाम बढा करने के चक्कर में, और बाकी लोगो को संस्था में जॉइन करने के चक्कर मे लगेंगा। जिस गुरु को तत्वमसि शब्द यथार्थ पता है वो भगवान की मूर्तियों से श्रीयंत्रो से कुंडलिनी के चक्रो के उलझनों से खुद दूर रहेगा और अपने शिष्यों भी अटकाएगा नहीं। इसलिए तत्वमसि शब्द को समझने के लिए पहले गुरु के पास रहा कीजिए ।

२) अब वह अक्षरतत्व जिसे अक्षरब्रम्ह क्या हैं? यह शब्द भगवत गीता में आया है। जिसे सचमे यह अक्षर ब्रम्ह समझ आए वह गीता छोड़ – कृष्ण को छोड़ … सीधा तत्वदर्शी गुरु के पास जाएगा।

कभी भगवत गीता पढो तो देखिए , कृष्ण ने कैसे उलझाया है। वो अर्जुन को कहता है , हे अर्जुन तुम क्षर ब्रम्ह और अक्षर ब्रम्ह को समझके लेलो और मूल तत्व समझना हो तो इनसे परे पूर्ण ब्रम्ह कोई ओर ही है , उसको समझो ।
अब , लोग ब्रम्ह ब्रम्ह करते है , सायन्स , बियोंड सायन्स की बाते करते हैं …. पर कोनसा ब्रम्ह? आपको यहां लाखो की की फीज लेकर भी वो विषय समझाने के लिए कोई गुरु नही बैठा।
अवधूत का अ अर्थात अक्षर ब्रम्ह को जानने वाला , अक्षर ब्रम्ह तत्व तो स्वयं शिव से भी परे की अवस्था है। क्योंकि शिव खुद ही क्षर ब्रम्ह है।
इसलिए मित्रो , यहां तो काफी लोग अद्वैत , शिव शिवा , अनेको साधनाए करते हैं पर रुद्र – शिव – सदाशिव – परमशिव , 16 – 36 तत्व शिवरूप पता नहीं होता , उनके लिए तो अक्षर ब्रम्ह विषय ही अलग है। जो खुद शिव से परे है वो खुद शिव शक्ति के मायावादी चक्करो में यंत्रो में मंत्रो में कुंडलिनी में हीलिंग में नही अटकेगा।
अक्षरब्रम्ह को समझना इतना ही काफी नही , परन्तु यहां आवश्यक ही दे रहे हैं।

३) अवधूत सांसारिक व्यवहार से मुक्त रहता हैं।

अब मित्रों , किसी गुरु का शिष्य होना भी तो एक संसार में बंधने जैसा हैं। फिर वही माया गुरु शिष्य को अनेको विषयो से बांधकर रखेगी। मुझे देश विदेश से फोन आते रहते हैं , किसी न किसी संस्था में लोग बहुत अंदरतक जुड़े रहते है और जब असलियत सामने आती है तो धक्का लगता है ।
एक ने मुझे कहा , हमारे गुरु के संस्था का केंद्र हमारे घर में हैं , केंद्र चलाने के लिए मेंबर्स को साल के कुछ xxहजार रुपये देने पड़ते हैं और अपने पड़ोसी को भी गुरुजी के प्रवचन सुनाने ज़बरदस्ती बुलाना पड़ता हैं , कभी कभी तो उनके पैसे हमें भरने पड़ते हैं। और हमें कोई दिक्कत आए तो हम गुरु से कोई उल्टा सवाल तक पूछ नहीं सकते , उल्टा गुरु कहते है कि संस्था को छोड़ोगे तो घर परिवार बिजनेस का नुकसान होगा तो डर के मारे पड़े रहते हैं।

अब मित्रों , कितना मायावाद फैला है देखो। ऐसे डरपोक व्यक्तियों जीवन तो तिहाड़ जेल में सड़ने जैसा है । एक तो मनुष्य जीवन दुर्लभ और केंद्र चलाने के लिए आध्यात्म के लिए पैसे दो , हे भगवान !!!! उल्टा पड़ोसी को लाने का पाप करना , उसकी गति नही हुई तो एक ब्रम्हांड बर्बाद करने का पाप आपके माथे । और ऐसे मायावादी केंद्र में सबका एकत्रित पूण्य संस्था को जाता है , जब कि शिष्यो का पुण्य क्षीण हो जाता है ।

अब सोचिए , सांसारिक व्यवहार से खुद गुरु ही मुक्त नहीं है फिर वो क्या शिष्यो को सिखाएगा । भारत में कुछ ऐसे मठ संस्था है जो आध्यात्मिकता का तात्विक ज्ञान देते हैं परंतु कोई धन नहीं लेते और आप अपने मन के सवाल भी पूछ सकते हैं।

इसलिए अवधूत जो है , उसके शिष्य होते ही नहीं। शिष्यो के गलतियां और उसके पीछे कौन लगेगा। भारत वर्ष के सन्तो का चरित्र पढ़िए , किसी भी सन्त के 2-3 छोड़कर कोई 10 भी शिष्य नहीं हुए । यह सब शेर से शेर पैदा करने जैसा है , भेड़ो की टोलियां नहीं ।

इस विषयो को समझने के लिए गुरु की संगति बहुत आवश्यक हैं , निगुरे का कोई नहीं होता । फ़ोटो वाले गुरु भी इसमें काम के नहीं ।
आपकी आत्मा को दत्त बनाना है , तो दक्षिणामूर्ति तो प्रत्यक्ष ही चाहिए ।

धन्यवाद ।
क्रमशः

© ~ परमेश्वरी निलयम ~
श्रीविद्या पीठम , ठाणे
Contact : 09860395985

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