Sri Vidya – From Shiv To Shav (शिव से शव की ओर) 3

Sri Vidya – From Shiv To Shav (शिव से शव की ओर) 3

◆ श्रीविद्या अंतर्गत शिव-शक्ति का भेदन (शिवलिंग) ◆
☘️ शिव से शव की ओर ☘️
भाग : 3

शान्तं पद्मासनस्थं शशिधरमुकुटम पंचवक्त्रं,
शूलं वज्रं च खंगम परशुमभयदं दक्षभागे वहन्तम ||
नागं पाशं च घण्टां प्रलयहुतवहं साङ्कुशं वामभागे,
नानालंकारयुक्तं स्फटिकमणिनिभं पार्वतीशं नमामि ||

“पद्माशन में शांत स्थिर महादेव अपने मस्तक पे चन्द्रमा तीन नेत्रों से युक्त दाहिने हाथ में त्रिशूल वज्र खंग परशु तथा अभय मुद्रा धारण किये हुए, बांये हाथों नाग पाशरज्जु घंटा प्रलायग्नी और अंकुश धारण किये हुए अनेक दिव्य अलंकारों से विभूषित स्फटिक मणि के सद्रश चमकते हुए भगवन भूत भावन शिव शंकर को बारम्बार मै नमन करता हूँ |

शिव अत्यंत तेजोमय, श्रेष्ठ कर्मों को संपन्न करने वाले समस्त द्रव्यों के स्वामी एवं विद्याधर हैं, अज्ञेय और अगम्य हैं एवं सभी के लिए सर्वदा कल्याणकारी हैं,  सदाशिव, जो भोलेनाथ नटराज हैं तो शक्तियुक्त और रसेश्वर भी है |

श्रीयंत्र के बिंदु रूप शिवलिंग का हम स्मरण अथवा पूजन कर रहे हैं। उसी बिंदु स्वरूप शिवलिंग अंतर्गत आध्यात्मिक जगत की एक बड़ी यात्रा का समावेशन है। द्वैत से अद्वैत को जाने रास्ता ।

जब श्रीविद्या अंतर्गत श्रीयंत्र अथवा शिवलिंग का वैज्ञानिक स्वरूप का अभ्यास होता है ,
तब श्रीयंत्र के ….. भूपुर से एक एक यात्रा होकर अष्टकोण – त्रिकोण ओर बिंदु तक आरोहण होता है।

यहीं बिंदु रूपी शिवलिंग अंतर्गत ” बिंदु-अर्धचंद्र-निरोधिनी-नाद- नादन्त- शक्ति – व्यापिनी- समना- उन्मना महाबिन्दु ई ” दीर्घ यात्रा अंतर्भूत रहती है।

शिवलिंग के कारण ही श्रीयंत्र में दो प्रकार बन जाते है । एक बिंदु रूपी शिवलिंग ओर एक नाद रूपी शिवलिंग ।
नाद रूपी शिवलिंग में श्रीयंत्र में बिंदु नही होता , वो त्रिकोण अंतर्गत जगह खाली रहती हैं। …… ऐसा क्यों , यह एक गहनतम ज्ञान है ।

यह अर्धचंद्र अथवा निरोधिनी क्या है? शिवलिंग में उनका समावेशन किस तरह से है? यह ज्ञान अपने श्रीविद्या सिखाने गुरु से लेना आवश्यक है। तभी जाकर गति की व्याख्या e=mc^2 को वास्तविक स्थिति समझेंगी।
अगर आप श्रीविद्या साधक है , श्रीयंत्र को घर मे रखकर उसकी पूजा कर रहे हैं , पंचदशी का जाप कर रहे हैं …… फिर बिंदु के अंदर उर्ध्व आरोहित नादों का ज्ञान होना चाहिए।  …..  अगर यह ज्ञान नही , फिर ऐसे आधी अधूरी विद्या साधक का आध्यात्मिक जीवन बर्बाद करती है।

अपने नाम के आगे-पीछे शिव लगाना और शिव के आनंद में होने का एक कृत्रिम एहसास में रहना , इस मूर्खता से समय पर उभरे ।
आपने अभीतक समझा होगा , की हम किस शिव तत्व की साधना कर रहे हैं। शिव-सदाशिव-रुद्र- कामेश्वर ? …… सबका कार्य अलग है ।

श्रीललिता सहस्रनाम अंतर्गत आदिपराशक्ति को ” पँचप्रेतासनस्थिता पँचब्रम्ह स्वरूपिणी ” इस रूप से देखा गया है।

श्रीललिता की तस्वीर देखे तो देवी के सिंहासन में चार खुर है उसमें ” ब्रम्हा-विष्णु-रुद्र-ईश्वर ” है , उनपर सदाशिव लेटे है , और सदाशिव के पेट पर श्रीललिता परमेश्वरी बैठी है।

इन पांचों तत्वो की अवस्था प्रेत इस में स्वरूप है।
प्रेत यानी संपूर्ण निष्क्रियता ।
इस प्रकरण से साधक को ” शिव तत्व ” को किस तरह समझ लेना जरूरी है , ………..
……. यह व्यक्तिगत आत्मचिंतन विषय है तथा किसी अच्छे सतगुरु की कृपा से ही शक्य है।

श्रीविद्या अंतर्गत शिवलिंग रूपी बिंदु की यात्रा में पंचदशी के पंधरह तथा षोडशी का सोलहवाँ बीजाक्षर शिवशक्ति अंतर्गत किस प्रकार समझ लेना है , इसका ज्ञान जरूरी है।

अंततः  इसका भी ज्ञान हो की , श्रीविद्या भी किसी और पराविद्या की अंगविद्या है।

श्रीविद्या साधना ” मोक्ष ” दाती साधना बतलाई गई हैं। पर वो भी किसी ओर विद्या की अंगविद्या है , फिर मोक्ष का मार्ग श्रीविद्या में किस मार्ग से चलता है ?
इसका ज्ञान गुरु से लेना चाहिए।
शिव पुराण में इस विषय में प्रत्यक्ष शिव ने देवी पार्वती का मोक्ष के लिए एक भेद का उल्लेख किया है।

देवी पार्वती …  शिव से , काल के विकराल स्वरूप को नष्ट करने का मार्ग पूछती है।
इसमे शिव , ” शब्दब्रह्म ” का उल्लेख करते हैं , शब्दब्रह्म की प्राप्ती ही मोक्ष कारक है । जो इसे जानता है वही मनुष्य मुक्त होता है , जो इसको नही जानते वह पापी कुबुद्धि होकर मृत्यु के फंदे में फंसे रहते हैं।
यह ” शब्दब्रह्म ” न ॐकार है न मंत्र है न बीज है न अक्षर है न इसका कोई आघात है । अतः नो प्रकारके शब्द है , इनको नादसिद्धि भी कहते हैं। घोष कांस्य श्रृंग घन्टा वीणा बाँसुरी दुदुंभी शंख मेघगर्जन ……इन नो प्रकार की शब्दो(नादों) का त्याग कर तुंकारका अभ्यास करें , वही असली शब्दब्रह्म है जो अद्वैतता है।
……. यह संपूर्ण विधान स्वतः शिव जी का है । आप स्वतः शिव पुराण का अभ्यास करें।

तात्पर्य ,
कुछ श्रीविद्या सिखाने वाले गुरु हजारो शिष्यो की टोली इकठ्ठा कर श्रीविद्या के पंचदशी मंत्र जप की दीक्षा देकर , यही पंचदशी जप मोक्ष देने वाला है , यह झूठ बोलते है।

ऊपरी वाक्यो से शिव जी ने मोक्ष प्राप्ति की सत्यता बतलाई है। फिर कितने लोगों ने अपने लाखो रुपये गलत गुरु को दक्षिणा देकर समय और पैसे की बर्बादी की । इस तरह कई साधक , गुरु के दबाव में गलत साधना करते हैं।

इसलिए श्रीविद्या अंतर्गत साधक को मोक्ष प्राप्ति के लिए ” पँचमवेद ” का ज्ञान दिया जाता हैं।
यही पँचमवेद का उल्लेख करते हुए , शिव कहते है की , ” हे पार्वती , अगर किसी साधक को आत्मकल्याण की चाहत हो तो उसे यह पँचमवेद का ही स्वाध्याय करना चाहिए। जिसका विवेचन में अगर करोड़ो युगों तक करता रहूँ फिर भी पूर्ण न हो सकेंगा। ”

शिव पुराण में शिव तत्व में विलीन होने संबधी ब्रम्हा कहते हैं , साधक को ” शिव-महेश्वर-रुद्र-विष्णु-ब्रम्हा-सन्सारवैद्य-सर्वज्ञ-परमात्मा ” इन आठ शिव तत्वों को समझना जरूरी है ,

जिसे शिव पाशुपत ज्ञान कहते हैं।

अब आप सोचे कि , स्वतः शिव ही ये सारी बात कर रहे हैं , फिर आप किस दिशा में जा रहे है ? श्रीविद्या साधना में , आपको इन सारे विषयो तत्वज्ञान गुरु से प्राप्त हुआ ?

इनमें ही , आगे शिव कहते है ……… शान्तातीता आदि पाँच कलाओ को ग्रहण करने से ही ” सदाशिव तत्व ” का बोध होता हैं।

अनुमान लगाए तो , …… एक ” शिवपुराण ” में ही शिव ने अपने आपको रुद्र – शिव – सदाशिव ओर खुद को  लेकर विभाजित कर दिया है ओर योग्य गुरु से इसे समझने को भी कहा है। ……

इस क्रिया में श्रीविद्या साधना अंतर्गत ओर गहराई से समझने के लिए ” प्रकृति तत्व – अहंकार तत्व – बुद्धि तत्व – आकाश तत्व – वायु तत्व – तेजस तत्व – जल – पृथ्वी तत्व तथा शुद्ध-शुद्धाशुद्ध-अशुद्ध तत्व ई. ” अनेक विषयों का अभ्यास गुरु के सानिध्य में करना पड़ता हैं।

लेख की पूरी श्रृंखला को देखेंगे तो , आप समझेंगे की एक श्रीविद्या साधक को विश्व के अलग अलग तत्व को समझने के लिए कितने अभ्यास की जरूरत होती हैं।

आपको , …. विलीन होने वाला ‘ शिव तत्व ‘ चाहिए कि ‘ शाश्वत शिव तत्व ‘ की अनुभूती करनी है ?
इसलिए , हर श्रीविद्या साधक  ( रुद्र – शिव – ईश्वर – सदाशिव – परमशिव ) इन सब तत्वों को समझे , अभ्यास करें , गुरु से ज्ञान ले ….. ओर अपने आपको साधना में एक ऊंचाई पर लाए ।
अन्यथा , परमशिव तत्व को ….. कोई साधक रुद्र रूप अथवा शिव में देखे तो यह ” परमशिव ” ( महाकामेश्वर ) का ही अपमान है । क्योंकि रुद्र – शिव – ईश्वर – सदाशिव  सब तत्व अपने कार्य समाप्त होने पर विलीन हो जाते है , शाश्वत नही रहते ।
शाश्वत है सिर्फ महाकामेश्वर ( परमशिव ) ।

इसलिए श्रीविद्या साधक , ” पूर्ण स्वच्छ गुरु ” से यह ज्ञान ले ।
तभी जाकर कोई शिवो:हं को प्राप्त हो सके।

यह सिर्फ एक शिव तत्व के विषय मे लेख है , ऐसे ही महाविष्णु और महाब्रम्हा तत्व के रूप का भी है ।

 || Sri Matre Namah ||

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