श्रीललिता सहस्रनाम Part : 1 ( श्रीमाता )

श्रीललिता सहस्रनाम
Part 1 , Word : श्रीमाता


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श्रीललिता सहस्रनाम यह स्तोत्र तो आप सभी जानते ही होंगे। दक्षिण भारत में यह स्तोत्र पढ़ने का संस्कार काफी समय पहले से हैं । हालांकि उत्तर भारत में इसे कम जगहों पर ही रोज के जीवन में पढ़ने वाले लोग हैं ।

श्रीविद्या साधना में प्राचीन काल में दीक्षा से पूर्व साधक के शरीर की दैवीय ऊर्जा बढाने हेतु ललिता सहस्रनाम के आवर्तन के रूप में पाठ करने का नियम था ।

जैसे कि श्रीविद्या को कादी विद्या कहा गया है यानी वह कामदेव ने की थी । कामदेव जी ने पहले श्रीविद्या दीक्षा नहीं ली थी । कामदेव जी की माता श्रीमहालक्ष्मी जी ने उन्हें प्रथम सौभाग्य अष्टोत्तर स्तोत्र के आवर्तन के पाठ करने को कहा था । पाठ के उपरांत कामदेव जी को देवी ललिता का अनुभव स्वप्न हुआ था ।

तो ये सब एक क्रम हैं और उसके नियम से चलता है ।
किसी भी दसमहाविद्या अथवा उपमहाविद्या की साधना से पूर्व उसके स्तोत्र सहस्रनाम कवच आदि के पाठ अगर कोई ठीक से करता हैं तो वह देवी खुद ही साधना के आगे के रास्ते खोल देती हैं ।

एक एक साधना यह समुंदर की तरह गहरी तथा लंबी हैं । जिसकी हम गहराई और लंबाई माप नहीं सकते ।

इसलिए किसी भी देवी देवता ओ माता के स्वरूप में अपनाकर उसके आशीर्वाद लेना जरूरी हैं । इसी आशीर्वाद को प्राप्त करने हेतु कवच स्तोत्र सहस्रनाम आदि विषय उतपन्न हुए हैं ।

इसलिए ही तो श्रीललिता सहस्रनाम में ” श्रीमाता ” इस शब्द से स्तोत्र की शुरुआत होती है ।

साधना में पड़ने से पूर्व तुम्हे एक रिश्ता बनाना जरूरी हैं । रिश्ता अटूट विश्वास से बनता हैं। 

अगर किसी व्यक्ति ने पैसे के दम पर हाथी अथवा शेरनी को घर में पालने की कोशिश की , तो होगा क्या ?
आप भलीभांति समझ ही गए होंगे ।
वो हाथी अथवा शेरनी को आप क्या है मालूम नहीं , आपको उससे कैसे रिश्ता बनाना है यह मालूम नहीं , दोनों के स्वभाव गुण एक कैसे होंगे ? क्या ये पैसे लेकर खरीदने की चीज है क्या ?

काफी कुछ चीजें हैं ।
मंत्र आपको किताबो में भी मिल जायेंगे ।
पर मंत्रो से एकरूप होना सिर्फ जाप करने से संभव नहीं है। 

मंत्र में छुपी स्त्री रूपी विद्या को समझने के लिए कवच स्तोत्रादि क्रियाओं से उस शक्ति रूप देवी से एक भावनिक संबध बनाना जरूरी हैं ।

इसलिए ही सर्वप्रथम श्रीललिता सहस्रनाम में श्रीमाता यह शब्द से ही शुरुआत हुई हैं ।

हर समय ” श्री ” शब्द का अर्थ आर्थिक लक्ष्मी नहीं होता । श्री अर्थात श्रेष्ठत्व दिखाने वाली शक्ति । माता , श्री स्वरूप हैं अर्थात वह श्रेष्ठ हैं ।

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