Sri Vidya – Varahi Protection Shield (श्रीवाराही कवच)

Sri Vidya – Varahi Protection Shield (श्रीवाराही कवच)

।। ◆ ।। श्री वाराही कवच ।। ◆ ।।

महासिद्ध श्रीदत्तात्रेय जी ने श्रीपरशुराम जी को कौल संप्रदाय अनुसार श्रीविद्या साधना दी , उसके अंतर्गत श्रीवाराही माता का कवच बहुत प्रभावी है । जिसे श्रीललिता सहस्रनाम में दंडनाथा कहा जाता है और जो रुद्र ग्रन्थी की देवता भी हैं।
यम भी श्रीवाराही का अवतार है , मृत्यु की देवता जिसने भण्डासुर युद्ध में असुरों का श्रीबाला त्रिपुरा के साथ प्रचंड विध्वंस किया था । जिसका , शूकर मुख अत्यंत सूक्ष्म जगह छुपी हुई नकारात्मक ऊर्जा भी ढूंढ निकालता है।
जिनको बाहरी अभिचारिक बाधा/प्रयोग से मानसिक प्रेशर रहता है , शत्रु की पीड़ा है , किसीको विशिष्ट कार्य में विजय प्राप्त कराना है , बाहरी बाधाओं से हड्डियों की संधिया दर्द होता तब इस कवच का कुछ दिन पाठ करें ।
श्रीविद्या साधना अंतर्गत 3rd स्टेप में श्रीवाराही विद्या की साधना करके , उसके उपरांत श्रीयंत्र पूजन तथा पंचदशी मंत्र की दीक्षा दी जाती हैं।

श्री वाराही कवचम् विनियोगः- ॐ अस्य श्रीवाराही-कवच-मन्त्रस्य श्रीत्रिलोचन-ऋषिः, अनुष्टुप्-छन्दः, श्रीआदि-वाराही-देवता, ग्लैं वीजं, स्वाहा शक्तिः, ऐं कीलकं, अभीष्ट-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः ।

ऋष्यादि-न्यासः- श्रीत्रिलोचन-ऋषये नमः शिरसि, अनुष्टुप्-छन्दसे नमः मुखे, श्रीआदि-वाराही-देवतायै नमः हृदि, ग्लैं वीजाय नमः गुह्ये, स्वाहा शक्तये नमः नाभौ, ऐं कीलकाय नमः पादयो, अभीष्ट-सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।

ध्यात्वेन्द्र-नील-वर्णाभां, चन्द्र-सूर्याग्नि-लोचनां । विधि-विष्णु-सुरेन्द्रादि-मातृ-भैरव-सेविताम् । हार-नूपुर-केयूर-वलयैरुप-शोभितां । ज्वलन्मणि-गण-प्रोत-मुकुटोज्ज्वल-शोभिताम् । शस्त्राण्यस्त्राणि सर्वाणि, स्व-कार्य-करणानि च । करैः समस्तैर्विविधैर्विभ्रतीं मुशलं हलम् ।

वाराही-देवि-कवचं, भुक्ति-मुक्ति-फल-प्रदं ।
पठेत् त्रिसन्ध्यं रक्षर्थ, रोग-शत्रु-निकृन्तये ।
मेघ-श्याम-रुचि मनोहर-कुचां नेत्र-त्रयोद्भासिताम्,
कोलास्यां शशि-शेखरामचलितैः दंष्ट्रा-तलैः शोभिताम् ।
बिभ्राणां स्व-कराम्बुजै रसि-लतां चर्मासि-पाशं सृणीम्,
वाराही मनु-चिन्तये ध्रुव-वरारुढां शुभालंकृतिम् ।।

ॐ वर्ताली मे शिरः पातु, वाराही भालमुत्तमं ।
नेत्रे वराह-वदना पातु, कर्णौ तथाऽन्धिनी ।
रुन्धिनी नासिका पातु, मुखं पातु सुजम्भिनी ।
पातु मे मोहिनी जिह्वां, स्तम्भिनी कण्ठमादरात् ।
स्कन्धौ तु पञ्चमी पातु, भ्रुवौ महिष-वाहिनी ।
सिंहारूढा करौ पातु, कुक्षौ कृष्ण-मुखी सदा ।
हलायुधं च वक्षश्च, मध्येमे मुशली मम ।
नाभिं तु शङ्खिनी पातु, पृष्ठ-देशे तु चक्रिणी ।
खड्गिनी पातु कट्यां तु, मेढ्रयोः पातु खेटकी ।
गुदं च क्रोडिनी पातु, जघनं स्तम्भिनी तथा ।
चण्डोच्चण्डा च ऊरु च, जानुनी शत्रु-मर्दिनी ।
जङ्घा-द्वयोर्भद्र-काली, चामुण्डा गुल्फयोर्द्वयोः ।
पादौ तदङ्गुलीश्चैव, पातु चोन्मत्त-भैरवी ।
सर्वाङ्गं सततं पातु, काल-सन्दीपनी मम ।
वाराही-कवचं दिव्यं, सर्व-सिद्धि-प्रदायकम् ।
सर्व-शत्रु-क्षय-करं सर्व-कार्य-करं शुभम् ।

 || Sri Matre Namah ||

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