Sri Vidya – Path To Moksha (मोक्ष को साधना) 3

Sri Vidya – Path To Moksha (मोक्ष को साधना) 3

◆ श्रीविद्या साधना अंतर्गत मोक्ष को साधना ? ◆
भाग : ३
यजुर्वेद कहता है।

‘‘यस्य योनि परिपश्यन्तिधीरा
तस्मिन् हतस्यु भुवनानि विश्वा’’

(जिस योनि को कामुक पुरूष अधीर होकर देखता है उसी योनि को दिव्यभावानुरागी कौल साधक समस्त ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने वाले ब्रह्म के स्वरूप में देखता है।)

गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि मेरी योनि ही ब्रह्म है-
‘‘मम योनि महद्ब्रह्म-तस्मिन्गर्भ दधाम्यह्म’’

इस मूल ब्रम्ह को श्रीविद्या से कैसे समझे ? और कैसे श्रीविद्या से मुक्ति पा सके ?

पिछले लेख में श्रीविद्या के विषय में प्राथमिक स्वरूप में ज्ञान जान लिया आपने । इसमे थोड़ा और गहराई से समझे ………

श्रीविद्या साधना में कौल – मिश्र – समय मार्ग है , वामाचार कौलाचार दक्षिणाचार भी है । पर बेसिक रूप से हमने पिछले लेख में श्रीविद्या के विषय मे दिया है।

किसी भी दसमहाविद्याओ की साधना से पहले उनके गणपति की साधना की जाती हैं। जैसे बगलामुखी का हरिद्रा गणपति है , मातंगी का उच्छिष्ट गणपति है ……. वैसे ही श्रीललिता के गणपति को क्षीप्रा गणपति कहते है , उनकी साधना श्रीमहागणपति रूप की जाती हैं।

श्रीविद्या जैसी बड़ी साधना का पथ बहुत ही दीर्घ रहता है । कोई साधक को अत्यंत कष्ट के बाद कोई फल की प्राप्ति होती हैं , तभी कोई शक्ति आकर उसे नष्ट कर देती है अथवा साधक के पीछे कुछ और ही पीड़ा लगती है ।
ये क्या हो रहा है समझ नही आएगा ।

सबसे पहले तो साधक अपने कुल – कुलाचार – पितरो को छोड़कर साधना करता है  , इनका विचार भी कोई नहीं करता ।  किसी भी विद्या में इनके मुक्ति अथवा साधक को कुलाचार-पितरो के आशीर्वाद प्राप्त करने चाहिए , उनके दोष लगे हो तो हटाने चाहिए ।
इसे दूर करने के लिए श्रीललिता नही आएंगी अथवा यहाँ पंचदशी मंत्र का कोई काम नहीं ।
कुलचारिक ओर पितरो की शुद्धि के लिए इसलिए ही श्रीविद्या में श्रीमहागणपति साधना दी हुई है ।
श्रीललिता सहस्रनाम मे उसे ब्रम्ह ग्रंथि विभेदीना भी कहते है , मुलाधार से स्वाधिष्ठान तक और यही श्रीयंत्र में भूपुर प्रदेश का स्वामी भी है । भूमि तत्व का प्रतीक ।

वेसे ही आगे श्रीराजमातंगी और श्रीवाराही साधना अपना अपना अलग अस्तित्व है ।
श्रीराजमातंगी देवी को विष्णु ग्रंथि विभेदीना कहा है । प्रेम की देवी । हृदय तत्व को शुद्ध करने वाली ओर संगीत की देवी । यह पराजगत के अनेक गुरूमण्डल तथा ब्रम्हांड में जो अनेक शक्तियाँ चलती है , उनसे अप्रत्यक्ष मैसेंजर का कार्य साधक के साथ करती है । यह मंत्रीणि भी है। मुख्यतः ललिता का तेज कोटि सूर्यो की तरह बताया है , उस तेज को सहन करने की शक्ति हमे मातंगी से प्रदान होती हैं।

श्रीवाराही देवी दंडनाथा होने से सेनापति भी है और श्रीललिता कि एक तरह से स्विय सेवक भी है । श्रीवाराही को आज्ञा चक्र में अवस्थित रूद्र ग्रंथी विभेदीना कहा गया है। किसी व्यक्ति को जीवन मे अभिचारिक प्रयोग हो , पिछले जन्म में साधना किसी गंभीर श्राप वश अथवा गलत विधान के कारण छुटी है , गंभीर पितृदोष ( घर मे आत्महत्या , खूनखराबा ) , गंभीर स्वरूप में कुलचारिक कुलदेवी के रोष से होने वाली नकारात्मक शक्ति , सप्तचक्रों में सप्तधातु सहित सप्त योगिनी यो को शुद्ध करने का कार्य यह साधना करती है ।
…….. यही श्रीललिता के द्वार खोलती है ।

इस तरह से हर एक विद्या का अपना एक उद्दीष्ट होता है ।
पंचदशी मंत्र का उद्दीष्ट आपके पितरो के दोष निकालना अथवा कुल कर्मो को साफ करना नही ।
बल्कि सृष्टि जिन तत्वों से बनी है उन पंधरह तत्वों को समझना और वही पंचदशी जब षोडषी मंत्र बनता हैं , अर्थात सोलहवाँ बीजाक्षर जब लगता है …. 15 + 1 = 16  ….. जैसे पंधरह बीज सृष्टि के प्रतिनिधित्व वेसे सोलहवाँ बीज इनसे परे होने का तत्व है ।

तैत्तिरियारन्यक संहिता में श्रीयंत्र का उल्लेख आता है ।
अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पुरयोध्या ।
तस्यां हिरण्मय: कोश: स्वर्गे लोको ज्योतिषावृत: ।।

सनातन धर्म मे जितने भी शास्त्र है , वेद पुराण श्रुति संहिता उपनिषद सबमे कहि न कही श्रीविद्या श्रीयंत्र तथा आदिपराशक्ति का स्वरूप कथन किया है ।

शंकराचार्य के चारो पीठों में प्रारंभ से आजतक श्रीयंत्र एवं श्रीविद्या अनवरत रूप से उपासना चली आ रही हैं।
आद्यशंकराचार्य प्रथम शैव होते हुए भी बाद में उनके जीवन बदलाव आया और उनके श्रीविद्या की दीक्षा लेनी पड़ी।
श्रीविद्या में कुछ जगह कादि हादी कहादी सादी विद्याओं का प्रयोग करते है । पर सामान्यतः आजकल कादि यानी कामराज निर्मित श्रीविद्या का ही प्रचलन है ।

आप , श्रीविद्या के साधक तथा आचार्य कामराज ओर लोपामुद्रा का जीवनकाल देखेंगे तो उनोने कभी सीधे पंचदशी की दीक्षा नही ली ।
कामराज यानी कामदेव को उनकी माता महालक्ष्मी से एक स्तोत्र मिला था , श्रीललिता को प्रसन्न करने हेतु ।
स्तोत्र के अत्यंत तीव्र साधना के उपरांत कामदेव को ललिता ने दृष्टान्त देकर पंचदशी के अक्षरों को दिखाया , इस विषय मे महालक्ष्मी ने भी मदत की थी । ( यह संवाद आप त्रिपुरा रहस्य पढ़े )
वेसे लोपामुद्रा जी की जीवनकथा देखे , तो उनोन्हे अपने पिता को भगमालिनी की साधना में मदत की थी । उसकी तीव्र लगन और प्रेम देखकर भगमालिनी देवी ने खुद पंचदशी मंत्र से श्रीललिता परमेश्वरी की साधना करने का सुझाव दिया था।

ऊपरी दो उदाहरण , इसलिए दिए हैं की , श्रीविद्या साधना अथवा पंचदशी की महत्तता साधक समझ सके । व्यक्तिगत जीवन को पहले साधना के तप में बदले । गुरु से संवाद रखे ।

श्रीविद्या साधना अंतर्गत मोक्ष को प्राप्त करणे की इस श्रृंखला में …. मेरे परमगुरु श्रीमहावतार बाबाजी के संबन्ध के श्रीविद्या के विषय मे एक कथा का भाग दे रहा हु , जो कही पब्लिश नहीं है।
श्रीमहावतार बाबाजी के पास हजारो सालो में  कुछ अत्यंत दिव्य शिष्य तयार हो चुके ओर विश्व में उनका कार्य गुप्त रूप से चल रहा है। उसीमे एक श्रीविद्यानंद  थे । जब उनका समय महावतार बाबाजी में पास पूरा हुआ । तब महावतार बाबाजी ने उन्हें एक मिशन पर भेजा , जो था ….. श्रीविद्या साधना के मूलभूत तत्वों को समझना ।  …… श्रीविद्यानंद खुश हुए , इसपर श्रीमहावतार बाबाजी ने उनका आगे रास्ता प्रशस्त किया ।  इनमें श्रीविद्यानंद जी को आदिशंकराचार्य – अश्वथामा – हनुमान – अगस्ति जी से मिलना था । ये चारों श्रीविद्या के साधक थे । महावतार बाबाजी ने आदिशंकराचार्य जी से मिलने का रास्ता बताया।
” हे श्रीविद्यानंद , आदिशंकरा तुम्हे बद्रीनाथ की गुप्त गुफाओं में मिलेंगे । जो पहले मेरे शिष्य थे। उनसे मिल । ”

श्रीविद्यानंद जी बद्रीनाथ की गुफाओं को पाच दिन तक ढूंढते रहे , कोई अतापता नही चला । फिर उनोन्हे बाबाजी ओर आदिशंकरा को प्रार्थना की , अंत मे  श्रीविद्यानंद जी ध्यान अवस्था में आदिशंकरा का बिंदु रूप आत्मप्रकाश ढूंढने में यशस्विता मिली। उस प्रकाश के पीछे हो चले और एक गुप्त गुफा में प्रवेश किया ।
प्रकाश ने धीरे धीरे पंचतत्वो का शरीर धारण किया , ये शरीर स्थूल पंचतत्व रूपी नही था । बल्कि सूक्ष्मावस्था में आत्मा का अलग पंचतत्व को मिलाकर प्रकाशमय स्फटिक जैसा शरीर था ।
जब दोनों रूबरू होकर मिले , तभी आदिशंकरा ने कहा , की आपको अपने मुहँ से बोलने की जरूरत नही । हम मन से ही बात करेंगे । तुमारा पहला सवाल यही होगा न कि मैने इस अवस्था को कैसे प्राप्त किया और कितनी यातनाएं झेली ? ……. मेरे पास जो अलौकिक बुद्धिमत्ता थी , उसको मेरे गुरु ने ही बढ़ावा दिया और मैने अपने सारे शत्रुओ को अपने ज्ञान के बल पर परास्त किया। इन सबसे गुजरते , मुझके एक अंहकार भी छुपा हुआ था।  मेरे ज्ञान अनुसार शिव ही शक्ति का प्रवर्तक था । इसलिए मैंने शिव-शक्ति में से शिव को चुन शैव संप्रदाय में गया । ओर मेने सभी मठो के मठाधीशों को परास्त किया ।
यह जबतक चला , की देवी ने मुझे पँचब्रम्ह के ऊपर क्या महाशक्ति का तत्व है ….. इसकी समझ न दी और दिखाया ।  जब मुझे असली ब्रम्ह तत्व को जाना तब शिव ने मुझे अद्वैतावस्था दी और शक्ति ने मुझे उसे पहचानने के लिए श्रीविद्या दी । उसके बाद मेने श्रीयंत्र की यथोचित पूजन और साधना करी ।
सर्वप्रथम में तुम्हे बता दु की , श्रीविद्या की साधना कैसे करनी है , प्रथम बाह्यपुजा ( स्थूल भक्ति )…. बाद में यही अन्तर्याग ( सूक्ष्म भक्ति )बन जाती हैं , यही सूक्ष्म भक्ति तीसरे अवस्था मे एक दिव्य ‘ योगिक मार्ग ‘ में बदल जाती हैं , जिसे क्रिया योग कहते हैं । अंत मे यही रूपांतर चौथे स्तर पर ‘ सूक्ष्म क्षमा ‘ अर्थात भक्ति की संवेदना नष्ट हो जाती है वो अवस्था ‘ महायाग ‘ कहते हैं।
इन सबको समझते हुए ध्यान में रखना , की गुरु को कभी अहंकार नही करना चाहिए । श्रीविद्या साधना के लिए शिष्य भी लायक चाहिए ।  ये चतुर्याग रूपी श्रीविद्या है । ”
इस कथा को आप ठीक से पढ़ेंगे तो कई सवाल मन में आएंगे की , पंचतत्वो वाला शरीर स्थूल भी है और साधना से उसे सूक्ष्म स्फटिक में बदला जा सकता है । श्रीविद्या साधक को पवित्र विद्या ग्रहण करने के लिए कितने मेहनत की आवश्यकता ओर अपने आपको पवित्र रखने की जरूरत है।

ओर ये सब सिखाने के लिए अपने गुरु की पात्रता केसी होनी चाहिए ।
यह विद्या , गुरु के संगत में रहकर ली जाती है । हजारो की टोली बनाकर नही ली जाती ।
साधक के जीवन मे श्रीविद्या की सही साधना से जीवन मे बदलाव आते है । पराजगत की पवित्र आत्माए आपसे संवाद साधती है ।

कथा को देने का उद्देश्य यही है कि आपका जीवन भी श्रीविद्या से आदिशंकरा की तरह प्रकाशमय बने ।
कुछ अद्वैत श्रीविद्या करते है । क्या उनमें इतने सालों में ऐसी अवस्था आई ? और गुरु भी इस लायक बना ?
…………………………..
श्रीविद्या साधना में पंचदशी मंत्र की दीक्षा दी जाती है । पंचदशी मतलब सृष्टि के 36 तत्व में से 15 तत्वों को समझने की साधना ।
पंचदशी दीक्षा में …. ” क ए ई ल ह्रीं  ह स क ह ल ह्रीं  स क ल ह्रीं  ” यह मंत्र दिया जाता है ।

इस मंत्र की दीक्षा देने से पहले ही शिष्य को बताया जाता है कि ये मंत्र मोक्ष देंगा । 🙂
फिलहाल , यहाँ लोगो के मन मे विचार रहता है कि ये मंत्र कैसा है ।  लोगो को आदत रहती है कि , किसी मंत्र का जप करना हो तो सीधे देवी का नाम होगा ……. फिर ……..
पंचदशी में ” क ” का मतलब क्या है ? ” ए ” का मतलब क्या है ? तीन ” ह्रीं ” बीजाक्षर हैं , उनका अर्थ क्या है? हर एक बीज में कितने नाद होते है ? ह्रीं में कितने नाद होते हैं ? ……… श्रीविद्या श्रापित होने के कारण , पंचदशी के जाप से कोई प्रभाव नही पड़ता । उसके लिए उत्कीलन मन्त्र है , श्रापोद्धार मंत्र है ।

कभी श्रीविद्या साधना देते समय , इन चीजों को गुरु समझाता है ? कुछ गुरु बताते है कि , इसके जवाब अपने आप मिलेंगे । …… फिर ऐसे लोगो को दस दस ऐसे गुरु के पास रहकर भी कुछ ज्ञान की प्राप्ति नही होती ।

इसलिए श्रीविद्या में पंचदशी की दीक्षा के समय , इन 15 बीजाक्षरों का मतलब समझलो । 15 बीजाक्षर सृष्टि के कौनसे तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। पंचदशी हर एक बीज में अलग अलग तत्व समाए हुए है ।

ये 15 तिथियां भी है और 15 नित्याए भी ।

यहाँ तक श्रीविद्या साधक संपूर्ण सृष्टि ब्रम्हांड के 36 तत्वों में सिर्फ 15 को समझ पाता है , अन्य 21 तत्व तो इसमे आते ही नही ।
क्योंकि , यही 15 तत्व श्रीललिता की निर्माण की हुई एक सृष्टि है , जिसमे सभी प्राणिमात्र जी रहे हैं , श्वास ले रहे हैं , एक प्रोग्राम की तहत ये दुनिया चल रही है । यहां आवागमन चलता रहता हैं। इसी दृश्य – अदृश्य रूपी 15 तत्व रूपी जगत को समझकर हम पार निकलते हैं , तब 16 वे तत्व को पहचान होती है ।

इस विषय में आगे की लेख में बात करेंगे ।

To be continued …..

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