Sri Vidya – Path To Moksha (मोक्ष को साधना) 4

Sri Vidya – Path To Moksha (मोक्ष को साधना) 4

◆ श्रीविद्या साधना अंतर्गत मोक्ष को साधना ? ◆
भाग : 4

वाक्कामशक्तिकूटैकरवयवशो विग्रहो मातु : ।
प्रतिपादयो त्राकण्ठादामध्यदा च पादाग्रात ।।
………. इस श्लोक में श्रीललिता त्रिपुरसुंदरी के पूर्ण शरीर वाग्भव कूट- कामराज कूट – शक्ति कूट के विषय मे बताया है।

श्रीविद्या के रहस्यार्थ में कहा गया है कि ,
साक्षाद्विद्दौवैषा न ततो भिन्ना जगन्माता ।
अस्या: स्वाभिन्नतत्वं श्रीविद्याया रहस्यार्थ: ।।
…… वाणी मन इन्द्रयों द्वारा अगम्य 36 तत्वों से अतीत महत्तम एवं सूक्ष्मतम , व्योम से उपर स्थित , विश्वाभिन्न परब्रह्म में अपने आपको ब्रम्ह के साथ अभेद की प्राप्ति हेतु नियुक्त करना चाहिए , यही श्रीविद्या का ” महत्त्ववार्थ ” है ।
इस अर्थ को आप गहराई से देखेंगे तो 36 तत्व का उल्लेख भी है और विश्व से भिन्न मूल परब्रह्म में अपने आपको साधने को कहा है । ……. यानी ये ” श्रीविद्या पंचदशी ” के सिर्फ जाप की रटन से संभव नहीं है। ओर 36 तत्व को समझना तो ओर आगे की बात हुई ।

जैसे आपने लेख के प्रथम दो भाग में , श्रीकृष्ण और शिव ने कहा है …… वही सत्य यहाँ प्रतीत होता है ।

……..

पिछले लेख में पंचदशी के 15 अक्षरों को यानी सृष्टिचक्र के 15 तत्व को देखा । …… देवी का सृष्टि विस्तार देखने हेतु ये 15 बीज है । इनसे परे होने के लिए आपको 36 तत्व में से 16 वा तत्व यानी बीज …. मदत करता है ।
यही है षोडषी दीक्षा ।
षोडषी दीक्षा में एक ह्रीं बीज आकर , षोडश अक्षर वाला मंत्र बनाता है।

षोडषी मतलब ” निर्वाण ” अवस्था ।
श्रीविद्या साधक स्थूल जगत को समझकर उनसे परे हो जाता है। उसे स्थूल जगत में किसीकी चाह लोभ नही रहता ।

लोग श्रीविद्या साधना में पंचदशी के बाद षोडषी की दीक्षा ग्रहण करना चाहते है । पर उसके अंदर के नियमो को नही समझ पाते ।
षोडषी दीक्षा के लिए प्रथम , गुरु के साथ कमसे कम एक साल तक रहने का नियम है ।  उसके बाद गुरु आत्मज्ञान की अवस्था मे शिष्य को लाकर रखता है।
इसमे शिव शक्ति के अभेद के विषय सहित , श्रीयंत्र के बिंदु में 9 नाद है उनको समझना जरूरी है , ( बिंदु- अर्धचंद्र – रोधिनी – नाद – नादन्त – शक्ति – व्यापिका – समना – उन्मना ) ………. अद्वैत श्रीविद्या को समझने के
लिए इन सबको समझकर उसी पथ से गुजरना पड़ता है।
इसीमे शिव-शक्ति का बैन्द्वपुर आता है जो पंधरह गुप्त भवन है , सदाशिव तत्व ओर ईश्वर तत्व के भी अलग अलग भवनों का अभ्यास है …… यह एक विस्तृत अभ्यास है , जिसे श्रीविद्या के गुरु पास रहकर सीखा जाता है ।

महाशक्ति का मूलस्थान सर्वातीत है । विश्व व्यापिका विश्वात्मिका होते हुए भी वह सदैव विश्वातीत अवस्था में रहती है । ये विश्व 36 तत्वों वाला गुणमय है ।
दस इंद्रिया + पंच तन्मात्रा रुपी जीव इस जगत को विलास का क्षेत्र मानता है …. यही है पंचदशी के 15 बीज ।  शक्ति इसे निरन्तर भग्न करती है ।  इसका अज्ञान का कारण यानी जीव में पास सोलहवें वस्तु ( बीज ) का अभाव ….. इसका ज्ञान गुरु से होता है …. यही षोडषी दीक्षा ….. यही सोलहवें बीज से साधक आत्मज्ञान की अवस्था में आ जाता हैं ओर ” निर्वाण ” अवस्था प्राप्त करता है ।

षोडषी दीक्षा में इस ज्ञान में गुरु ” पँचमवेद ”  का ज्ञान देता है । समय उपरांत योग्य मुहूर्त पर शिष्य को वेदी पर बिठाकर पवमान सूक्त से पूर्णाभिषेक होता है , शिष्य का नामकरण भी होता हैं ।
परन्तु षोडषी उसे ही मिलती है जो पाँचो आम्नायो में सिद्ध हो ।

षोडषी की ” निर्वाण ” अवस्था मतलब ,
निर्वाण का सटीक अर्थ है- ज्ञान की प्राप्ति- जो मन (चित्त) की पहचान को खत्म करके मूल तथ्य से जुड़ाव पैदा करता है। सैद्धांतिक तौर पर निब्बाण एक ऐसे मन को कहा जाता है जो “न आ रहा है (भाव) और न जा रहा है (विभाव)” और उसने शाश्वतता की स्थिति को प्राप्त कर लिया है, जिससे “मुक्ति” (विमुक्ति) मिलती है।

परन्तु ये भी मूल मोक्ष की अवस्था नही है ।
इसमे सिर्फ जीव पाश जाल से छूट जाता है और शिव भाव को प्राप्त होता है।  किंतु महाशक्ति का साक्षात्कार तभ भी नहीं हो पाता ।
इसके लिए शिव से शव भाव मे आना पड़ता है , जब साधक अपना शवासन रूपी शरीर महाशक्ति को अर्पण करते हैं , तब उस साक्षात्कार का संभव हो पाता है ।

इसे भी मूल मोक्ष नही कहते ।
इस अवस्था में साधक संपूर्ण सृष्टि की मुलशक्ति को समझता है ओर अपने आपको दिव्य बनाता है ।
यह है पँचप्रेतासन पे आरूढ़ श्रीराजराजेश्वरी परमेश्वरी का अन्तः बाह्य जगत ।

इन सबको , बगलामुखी की पँचस्त्र दिव्य प्रयोग में से एक बृहदभानुमुखी दिव्यस्त्र प्रयोग इतना तीखा है कि उसके प्रयोग से त्रिपुरा अर्थात ललिता का सव्वा करोड़ समुदाय , पचास करोड़ भैरव , राक्षस समुदाय , नरसिंह तथा करोड़ो पुतनाओ का सन्तभन किया जा सकता है ।

यह बहुत गहन विषय है , तथापि इन सब विषयो को साधक के सामने रखा है , क्योंकि ” मोक्ष ” की व्याप्ति हमे समझे ।

लेखों के विषय से तात्पर्य यही है कि आपको सिर्फ पंचदशी मंत्र का जाप मुक्ति नही देंगा अथवा षोडषी दीक्षा भी मुक्ति की अवस्था नही देंगी ।
अतः शिव ने शिवपुराण में बताए हुए , शब्दतत्वं शब्दब्रह्म की ओर चलना चाहिए और उसकी असली पहचान गुरु करनी चाहिए ।

यही श्रीविद्या उर्ध्वंमुखी बन जाती है , जहाँ गुरु ” पँचमवेद ” का मार्ग साधक को खुला करता है ।

यह वो अवस्था है कि , जहाँ साधक मोक्ष प्राप्ति कब इस मार्ग में श्रीविद्या को भी छोड़ देता …… उससे आगे श्रीविद्या को सन्तभित करने वाली पराविद्या को भी छोड़ देता है …… ओर मोक्ष के लिए सच्चे सतगुरु के चरण पकड़ लेता है ।
जैसा श्रीकृष्ण ने गीता में कहा , तत्वदर्शी गुरु ही मोक्ष प्रदान कर सकता है ।

लेख में इन सब विषयो का देना जरूरी था । कि श्रीविद्या के विस्तार को न समझ के , अधूरे गुरु के ज्ञान से संमोहित होकर अनेक लोग पंचदशी का जाप मोक्ष के लिए करते है । …. फिर होता कुछ नहीं । समय की बर्बादी ओर ऐसे लोग गुरु से सीधे बात भी नहीं कर सकते ।

श्रीविद्या की पवित्रता रखना सामान्य नही है , जीवन को तप में बदलना पड़ता है। यह मिर्च के पानी जैसा है , सही मार्गदर्शन न मिलने पर शक्तियाँ साधक का भक्षण तो करती है और कुलाचार का विध्वंस भी हो जाता है ।

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