Pillars of SriVidya Sadhna

Pillars of SriVidya Sadhna

||~|| Pillars of SriVidya Sadhna ||~||


ॐ क्रिया महावतार बाबाजी प्रसन्नोस्तु ।।
ॐ क्रियाशक्ति ललितायै नमः ।।

नमस्ते मित्रों , आप सभी का हमारे श्रीविद्या संजीवन साधना सेवा पीठम , ठाणे में स्वागत है ।

आज एक महत्वपूर्ण अभ्यास विषय पर लेख प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

श्रीविद्या साधना के मूलभूत पिलर्स क्या है ?

देखिये मित्रो , श्रीविद्या साधना को भोग – मोक्ष दोनों के नाम पर दिया जाता हैं ।
पर कभी आपने सोचा , क्या यह सब उतना भी आसान है ?
जिसे ब्रम्हविद्या कहकर पुकारा है , क्या वह कुछ ही समय में श्रीयंत्र सामने रखकर प्रसन्न हो सकेंगी ?

क्या दत्तात्रेय जी , परशुरामजी ने भी एक दो दिन में सब पाया ? परशुरामजी का चरित्र देखने पर आपको समझमें आएंगा की माया ने उनके साथ कितना लंबा खेल खेला और उसमें कितने सेकड़ो साल चले गए , जब राम जी आए तब जाकर माया का प्रभाव टूटा और श्रीविद्या साधना उन्हें मिली ।

आदिशंकराचार्य जी का भी वैसा ही , उम्र की 13वे साल तक उनोने अद्वैत शिवतत्व ज्ञान ग्रहण किया , जब चांडाल से हारे तब जाकर पश्चाताप हुआ की उन्होंने सिर्फ अद्वैत शैवतत्व का ज्ञान सिर्फ थिअरी ली है , उसमें अद्वैत शिव बिना शक्ति कार्यरत नहीं । 
तब जाकर उन्होंने श्रीविद्या साधना दीक्षा लेकर द्वैत शक्ति को ग्रहण किया ।
आपको उनके चरित्र से यह पता चलेंगा ।

इसलिए , आजके समय में व्यक्ति को श्रीविद्या साधना करने से पूर्व उसके पिलर्स क्या है ये तो सामान्य समझ आए ।

यह बहुत महत्वपूर्ण जानकारी सबको लेनी चाहिए ।

हम हमारे श्रीविद्या पीठम में इन सब जानकारी को देने की कोशिश करते हैं ।

१) मूल श्रीविद्या महाशिव जी के छह मुखों से निकली हैं , इन छह मुखों के किस मुख से आप श्रीविद्या दीक्षा ग्रहण कर रहे हैं ।
उसे आम्नाय कहा जाता हैं ।
श्रीविद्या का कुल इसे कहते हैं ।
इसमें मोक्ष का मार्ग छुपा हैं ।
हर श्रीविद्या साधक को गुरु यह आम्नाय बताता है , बिना आम्नाय समझे श्रीविद्या पूर्ण नहीं ।

२) दूसरा पिलर हैं , श्रीविद्या साधना में गुरूपादुका मंत्र ।
यह अत्यंत महत्वपूर्ण मंत्र है ।
मानो यह पहली स्टेज अथवा जैसे कहते है न कि माता बच्चे की पहली गुरु होती हैं ।
वैसे ही श्रीविद्या में गुरूपादुका मंत्र साधक का पहला मंत्र होता हैं ।
इससे रक्षासूत्र बनाया जाता हैं ।

३) तीसरा पिलर है , श्रीविद्या साधना में मोक्ष अथवा मूल मुक्ति को समझने के लिए पँचमवेद  का ज्ञान लेना ।
बिना पँचमवेद समझे श्रीविद्या पूर्ण नहीं होती ।
यह गुरु परंपरा से दिया जाता हैं ।
जैसे दत्तात्रेय जी ने परशुरामजी को दिया ।
इस पँचमवेद में असली पराविज्ञान छुपा हुआ है ।

४) चौथा पिलर है , श्रीविद्या साधना में बाला देवी जी का तीन अक्षरी मंत्र है – ललिता देवी जी का पन्ध्रह अक्षर वाला मंत्र – षोडषी  देवी का सोलह बीजाक्षरों वाला मंत्र ।
इन 3-15-16 बीजाक्षरों के अंदर कोनसे तत्व छुपे हुए हैं , जो ब्रम्हांड के तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं ।
अगर मंत्र ही नही समझा तो उसका उपयोग भी नहीं ।
गुरुका यह महत्वपूर्ण कार्य है ।

५) पाँचवा पिलर है , श्रीविद्या साधना में अन्तर्याग मानसपूजन करते समय , बहुत लोग श्रीयंत्र के आखरी  त्रिकोण को आज्ञा चक्र में ड्रॉ करते हैं , बल्कि वह तो श्रीयंत्र के बिंदु का स्थान है ,
फिर त्रिकोण की कल्पना कहा करनी चाहिए और बिंदु की कल्पना कहा करनी चाहिए , यह समझ आवश्यक हैं ।
अन्तर्याग में श्रीयंत्र की शरीर के ऊपर कल्पना पूर्व दिशा से करते है , जिसमे त्रिकोन 🔺 ऐसा होता है , बल्कि अन्तर्याग में 🔻त्रिकोन उलटा कल्पना करके पूजन करते हैं ।
यह सृष्टी चक्र रहस्य और संहार चक्र रहस्य का खुलासा समझना आवश्यक हैं ।

६) छठवा पिलर है , श्रीविद्या साधना में शिव और परमशिव  को समझना ।
हम जिस को समझते है वो 16 तत्व रूपी है , जो हर कल्प में बदलते हैं । यह शिव तत्व भी किस मूल परमशिव तत्व से प्रकाशित अथवा जन्म लेता है , वह 36तत्व रूपी मूल परमशिव को समझना ।
यह सिर्फ शिव शिवा कहकर कुछ नहीं होता ।
साधक को सही ज्ञान से अपने दृष्टिकोण को उतना विस्तारित करना आवश्यक है ।
खुद शिव जी अपने इस शिव-परमशिव का भेद खोला है ।

7) सातवाँ पिलर है , श्रीविद्या साधना में कुण्डलिनी  को समझना ।
इसमें कुंडलिनी जागरण नही होता , बल्कि विकास कैसे हो सके कुंडलिनी का इसपर विचार किया जाता हैं ।
क्योंकि , कुंडलिनी चल ही रही है और जो चल रही है उसे कौन कैसे फिरसे चला सकता हैं ।
फिर , वह प्रोसेस के विषय पर मार्गदर्शन किया जाता हैं ।
श्रीविद्या में कुंडलिनी की साईझ कितनी सूक्ष्म है , सहस्रार से कैसे टनेल्स से बहार निकले , 
मूलाधार चक्र में छुपा काले रंग का सर्प ऊपर चढ़ते समय किस रंग में परावर्तित होता हैं , 
7चक्र और 7बॉडी क्या है , 
किस चक्र में द्वैत समाप्त होता है और किस चक्र में अद्वैत समाप्त होता है , द्वैत को अद्वैत से तोड़ने की क्रिया का ज्ञान ….. इन सब विषयो पर मार्गदर्शन होता है ।

8) आठवा पिलर है , कुण्डलिनी में सहस्रार से लेकर आगे तक का सफर श्रीविद्या साधना में कैसे बताया है , जिसे श्रीयंत्र के बिंदु से लेकर महाबिन्दु तक की यात्रा कही है ।

9) नोवा पिलर है , श्रीं ह्रीं ऐं  जैसे बीजाक्षरों में मूल नाद  कितने है और उसका श्रीयंत्र में निर्मिती कैसे होती है ।

10 ) दसवा पिलर है , बाला – ललिता -षोडषी – राजराजेश्वरी यह रुपों ट्रांसफॉर्मेशन किस प्रकार है । पराशक्ति अपने को किस किस प्रकार प्रतिरूपित करती है।

11) ग्यारहवा पिलर है , देवी और देव  संबोधन उसे लगाया जाता है जिसके शक्ति की मर्यादा है और जिनकी कार्य समाप्ती होती है । फिर श्रीललिता माता को किस संबोधन से श्रीविद्या में पुकारा जाता है , जो शाश्वत सत्य है और जिसकी मृत्यु नहीं होती । यह महत्वपूर्ण स्थान है ।

12) बारहवा पिलर है , श्रीविद्या साधना मानसपूजन में 64 प्रकार के उपचार  शरीर एक चक्र में अलग रूप से करने होते हैं , जो की बहुत जगह पर किया नहीं जाता । अगर श्रीललिता माता के ऊपर 64 उपचार ही नहीं हुए तो साधक के शरीर रूप श्रीचक्र में पराशक्ति का प्रकाश कैसे आवाहित होगा ।
64 उपचार यह आवश्यक है ।

13) तेरावा पिलर है , दसमुद्रा  दिखाना ।
इन दसमुद्रा श्रीयंत्र में शक्तियाँ आवाहित कर साधक शरीर में खिंची चली आती है । सर्वसंक्षोभिनि , सर्वविद्रविनि जैसे दस मुद्राएं है ।

14) चौदहवे पिलर है , इसमें सबसे श्रीललिता के विग्रह पर कुछ गुप्त ओषधियों से महाभिषेक होता है । नैसर्गिक द्रव्य से किया हुआ अभिषेक जल्दी शक्ति खिंचने में मदत करता है ।

15) पन्द्रहवां पिलर है , इसमें महाशक्ति तीन रूपों में विस्तारित है । बाला – ललिता – षोडषी देवी ….. तीनों के मंत्र 3 बीजाक्षर – 15 बीजाक्षर – 16 बीजाक्षर  वाले ।
जिन्हें बाला मंत्र त्रयक्षरी , ललिता का पंचदशी , षोडषी देवी का षोडषी जप कहलाता हैं । ये बीजाक्षर क्या है ?
इनके वास्तविक अर्थ को समझाया जाता है ।

16) सोलहवें पिलर में , बाला – ललिता – षोडषी देवियों के हातो में आयुध  है , उनके अर्थ और मर्म का अभ्यास है। तीनो देवियों के आयुध बदल देते । बाला देवी के हातो में आयुध नहीं है , षोडषी देवी के हातो में तोते का अर्थ का वास्तविक अर्थ समझना आवश्यक हैं ।

17) सतरावे पिलर में , वामा – ज्येष्ठा – रौद्री – शांता  इनका अभ्यास आवश्यक हैं । इनका संबध किसपर चार पीठो से है , तथा चार वाणियों से है । इच्छा – ज्ञान – क्रिया शक्ति  को इन्हें कैसे जोड़े ।

धन्यवाद ।

इन सब ज्ञान को विस्तार रूप से समझने के लिए , हमारा  online Course द्वारा इसे गहराई से समझ सकते हैं ।

Sri Vidya Essentials

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