Sri Vidya – Shiv Tatva Grantha

Sri Vidya – Shiv Tatva Grantha

◆ श्रीविद्या अंतर्गत शिव तत्व के ग्रंथ ◆

श्रीविद्या साधने दीर्घ सूत्री ज्ञान विषय मे , श्रीविद्या साधक को शिव जी ने कितने सारे ज्ञान की चर्चा करके रखी है और हमारे पुर्वजों ने भी कितना अभ्यास करके हमारे लिए कितने ग्रंथ शास्त्र छोड़े है , इसका सामान्य ज्ञान होना चाहिए ।

कुछ जगहों पर कुछ श्रीविद्या साधको को लगता है कि वो मूलतत्व को सिद्ध कर रहे हैं , उनके गुरु ने उनको कुछ श्रीविद्या के नामपर मृत्युंजय , सँजीवनि , पंचदशी के मंत्र दिए हैं और उससे वो अद्वैतता को प्राप्त होंगे । पर दस पंधरह साल बाद भी इतने जाप करने के बाद हात कुछ नहीं लगता । ओर ऐसे गुरु हमेशा यही कहते है कि जाप करो ज्ञान अपने आप बरसने लगेंगा ।
कितनी मूर्खता वाली बातें होती हैं ये ।

साधक को भी शास्त्रों को खोलके देखना चाहिए कि ज्ञान क्या कहता है ।  कोई भी विद्याए किस तरह से धारण करनी चाहिए ।
गलत गुरू के संगत में श्रीविद्या लेकर हजारो लोग फस जाते हैं ।
यहाँ तक , ऐसे लोगो कितने साल होने पर भी परमशिव से निकले 36 तत्व , उनकी पाच कलाओं को सदाशिव तत्व से कैसे जुड़ा है जिससे कि सृष्टिचक्र की रचना में उनका तत्व अभ्यास क्या है , मूल परमशिव से शिव की उतपत्ति कैसे हुई है , शिव के द्वदशान्त का विज्ञान क्या है , शिव अनाश्रित क्यों हुआ और आश्रित क्यों हुआ , शिव के पाँच मुखों से पाँच आम्नाय निकले उनमें आपकी श्रीविद्या साधना किस आम्नाय का मार्ग है , … ऐसे कई सारे अभ्यास है । जो श्रीविद्या में गुरु के पास होते हैं ।

इसलिए एक बार प्रत्यक्ष शिव जी ने कितने सारे ज्ञान की चर्चा की है , उसको भी एक बार नजर घुमाए ।

वैचारिक मत से तंत्र शास्त्र चार भागों में विभक्त है।
१. आगम शास्त्र २. यामल शास्त्र ३. डामर शास्त्र ४. तंत्र शास्त्र

प्रथम तथा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आगम ग्रन्थ माने जाते हैं, ये वो ग्रन्थ हैं जो शिव जी तथा पार्वती या सती के परस्पर वार्तालाप के कारण अस्तित्व में आये हैं तथा भगवान विष्णु द्वारा मान्यता प्रदान किये हुए हैं।
भगवान शिव द्वारा बोला गया तथा पार्वती द्वारा सुना गया ग्रन्थ आगम नाम से जाना जाता हैं इस के विपरीत पार्वती द्वारा बोला गया तथा शिव जी के द्वारा सुना गया निगम ग्रन्थ के नाम से जाना जाता हैं।

इन्हें सर्वप्रथम भगवान विष्णु द्वारा सुना गया हैं तथा उन्हीं से इन ग्रंथो को मान्यता प्राप्त हैं।

भगवान विष्णु के द्वारा गणेश को, गणेश द्वारा नंदी को तथा नंदी द्वारा अन्य गणो को इन ग्रंथो का उपदेश दिया गया हैं।

आगम ग्रंथो के अनुसार शिव जी पंचवक्त्र हैं, अर्थात इन के पाँच मस्तक हैं, १. ईशान २. तत्पुरुष ३. सद्योजात ४. वामदेव ५. अघोर। शिव जी के प्रत्येक मस्तक, भिन्न भिन्न प्रकार के शक्तिओ के प्रतिक हैं; क्रमशः सिद्धि, आनंद, इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया हैं।

भगवान शिव मुख्यतः तीन अवतारों में अपने आप को प्रकट करते हैं १. शिव २. रुद्र तथा ३. भैरव, इन्हीं के अनुसार वे ३ श्रेणिओ के आगमों को प्रस्तुत करते हैं १. शैवागम २. रुद्रागम ३. भैरवागम। प्रत्येक आगम की श्रेणी स्वरूप तथा गुण के अनुसार हैं।

शिवागम : भगवान शिव ने अपने ” ज्ञान ” को १० भागों में विभक्त कर दिया तथा उन से सम्बंधित १० अगम शिवागम नाम से जाने जाते हैं।
१. प्रणव शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, कमिकागम नाम से जाना जाता है।
२. सुधा शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, योगजगाम नाम से जाना जाता है।
३. दीप्त शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, छन्त्यागम नाम से जाना जाता है।
४. कारण शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, करनागम नाम से जाना जाता है।
५. सुशिव शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, अजितागम नाम से जाना जाता है।
६. ईश शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, सुदीप्तकागम नाम से जाना जाता है।
७. सूक्ष्म शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, सूक्ष्मागम नाम से जाना जाता है।
८. काल शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, सहस्त्रागम नाम से जाना जाता है।
९. धनेश शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, सुप्रभेदागम नाम से जाना जाता है।
१०. अंशु शिव और उनसे सम्बंधित ज्ञान, अंशुमानागम नाम से जाना जाता है।

रुद्रागम :
रुद्रागम १८ भागों में विभक्त हैं। १. विजय रुद्रागम २. निश्वाश रुद्रागम ३. परमेश्वर रुद्रागम ४. प्रोद्गीत रुद्रागम ५. मुखबिम्ब रुद्रागम ६. सिद्ध रुद्रागम ७. संतान रुद्रागम ८. नरसिंह रुद्रागम ९. चंद्रान्शु रुद्रागम १०. वीरभद्र रुद्रागम ११. स्वयंभू रुद्रागम १२. विरक्त रुद्रागम १३. कौरव्य रुद्रागम १४. मुकुट और मकुट रुद्रागम १५. किरण रुद्रागम १६. गणित रुद्रागम १७. आग्नेय रुद्रागम १८. वतुल रुद्रागम

भैरवागम :
भैरवागम के रूप में, यह ६४ भागों में विभाजित किया गया है।
१. स्वच्छ २. चंद ३. कोर्च ४. उन्मत्त ५. असितांग ६. महोच्छुष्मा ७. कंकलिश ८. ………… ९. ब्रह्मा १०. विष्णु ११. शक्ति १२. रुद्र १३. आथवर्ण १४. रुरु १५. बेताल १६. स्वछंद १७. रक्ताख्या १८. लम्पटाख्या १९. लक्ष्मी २०. मत २१. छलिका २२. पिंगल २३. उत्फुलक २४. विश्वधा २५. भैरवी २६. पिचू तंत्र २७. समुद्भव २८. ब्राह्मी कला २९. विजया ३०. चन्द्रख्या ३१. मंगला ३२. सर्व मंगला ३३. मंत्र ३४. वर्न ३५. शक्ति ३६. कला ३७. बिन्दू ३८. नाता ३९. शक्ति ४०. चक्र ४१. भैरवी ४२. बीन ४३. बीन मणि ४४. सम्मोह ४५. डामर ४६. अर्थवक्रा ४७. कबंध ४८. शिरच्छेद ४९. अंधक ५०. रुरुभेद ५१. आज ५२. मल ५३. वर्न कंठ ५४. त्रिदंग ५५. ज्वालालिन ५६. मातृरोदन ५७. भैरवी ५८. चित्रिका ५९. हंसा ६०. कदम्बिका ६१. हरिलेखा ६२. चंद्रलेखा ६३. विद्युलेखा ६४. विधुन्मन

अगर मूलतत्व की ओर जाना उतना ही आसान होता तो शिव जी को इतना सारा ज्ञान विसत करने की कोई आवश्यकता न थी ।
ज्ञान विस्तार का तातपर्य और उद्देश्य साधक को समझना चाहिए ।
अतः श्रीविद्या साधक को कितने सारे विषयो से गुजरना पड़ता है , इसका अभ्यास रखे । श्रीविद्या कुछ अच्छे अभ्यासु साधक होते हैं जो नियमित रूप से नए विषय की तलाश में रहकर उसको अपनी डायरी में लिखते है , उस ज्ञान के विषय मे अपने गुरु से चर्चा करते हैं और आगे बढ़ते हैं ।

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