Sri Vidya: Vahni Kundalini (वह्नि कुंडलिनी)

Sri Vidya: Vahni Kundalini (वह्नि कुंडलिनी)

◆ श्रीविद्या अंतर्गत वह्नि कुण्डलिनी तत्व ◆

श्रीविद्या में जब कुण्डलिनी शब्द के ऊपर का विषय आता है , तो श्रीविद्या के प्राचीन ग्रन्थों में उसे किस प्रकार अभ्यासा गया है , देखना जरूरी है।

श्रीविद्या में कुछ जगहों पर कुण्डलिनी पर पंचदशी का मंत्र का जाप कर , उससे कुण्डलिनी जागृत होगी , ऐसा कहा जाता है , ….. कुछ साधक भी अपनी तर्क बुद्धि न लगाकर , वही करते हैं ।
श्रीविद्या में कुण्डलिनी के विस्तार को ध्यान नही देते ।
इसमे , श्रीयंत्र की रचना शरीर पर करना और कुण्डलिनी से आगे उठना , दोनों विषय एक होकर भी अलग है । इनको लिखकर पूरा समझाया नही जा सकता ।

ज्वलनाघातपवना घादोरुन्निद्रितोऽहितोऽहिराट् । ब्रह्मग्रन्थि ततो भित्वा विष्णुग्रन्थि भिनत्त्यतः । रुद्र ग्रन्थि च भित्त्वैव कमलानि भिनत्ति षट् । सहस्रकमले शक्तिः शिवेन सह मोदते ।। सैवावस्था परा ज्ञेवा सैव निर्वृतिकारणा ।। —योगकुंडल्युपनिषद् …….

……. अग्नि और प्राणवायु दोनों के आघात से सुप्ता कुण्डलिनी जाग पड़ता है और ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि, रुद्रग्रन्थि तथा षट्चक्र का भेदन करती हुई सहस्रार कमल में जा पहुंचती है। वहां यह शक्ति शिव के साथ मिलकर आनन्द की स्थिति में निवास करती है। वही श्रेष्ठ परा स्थिति है यही मोक्ष का कारण है।

श्रीविद्या में यह कुण्डलिनी ” वह्नि ” शब्द क्या है ?

विज्ञानभैरव के 67वें श्लोक में ” वह्नि और विष ” शब्दों की चर्चा आई है।
यहाँ वह्नि का अधःकुण्डलिनी से संबन्ध है और विष का ऊर्ध्व कुण्डलिनी से। अध:कुण्डलिनी मतलब मुलाधार और ऊर्ध्व कुण्डलिनी मतलब सहस्रार ।

साधना के अंतर्गत तपोबल का अधःकुण्डलिनी में प्रवेश (आवेश) संकोच अथवा वह्नि (अग्नी) कहलाता है और ऊर्ध्व कुण्डलिनी में प्रवेश विकास अथवा विष कहलाता है।

वह्नि का प्राण से संबंध है और विष का अपान से।

जब प्राण सुषुम्ना में प्रवेश करता है और अधःकुण्डलिनी अथवा मूलाधार तक जाता है, तब इस दशा को वह्नि कहते हैं।

अधःकुण्डलिनी के मूल और आधे मध्य तक में प्रवेश वह्नि अथवा संकोच कहलाता है। वह्नि शब्द वह् धातु से निष्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है – उठाकर ले जाना।

अग्नि को वह्नि इसलिये कहा जाता है कि यह जो कुछ उसमें हवन किया जाता है, उसे देवों तक उठाकर ले जाता है।
प्रस्तुत प्रसंग में वह प्राण को मूलाधार तक उठाकर ले जाता है। इससे जीव का स्वरूप संकुचित हो जाता है। वह्नि शब्द इसी दशा का बोधक है।

योगशास्त्र में मानव शरीर स्थित आधारों की चर्चा आई है। इनमें से लिंग के ऊपर नाभि से चार अंगुल नीचे वह्नि नामक आधार की स्थिति मानी गई है। नित्याषोडशिकार्णव (5/1) और तन्त्रालोक (3/165-170) में काम तत्त्व के रूप में इसका वर्णन किया गया है। गोरक्षनाथ कृत अमरौघशासन (पृ. 8-9) में भी यह विषय चर्चित है।

सामान्यतः बहुत जगह मेडिटेशन में जो ध्यान होता है , वो कॉन्शियस रूप में होता ही नहीं । अनेक साधक ध्यान लगाते वक़्त कई सारे विषयो की अथवा अलग अलग चीजों की कल्पना करते अथवा इमेजिनेशन करते , उसीको वह ध्यान साधना कहते हैं । सच तो , इसे ध्यान न कहकर मेडिटेशन में खुदको संमोहित करने की क्रिया है , जिससे साधक आगे बढ़ना नही चाहता । ये विषय अत्यंत घातक है ।
90% ध्यान की संस्थाओं में मेडिटेशन एक संमोहन के रूप में इस्तेमाल किया जाता हैं , Pure Meditation क्रिया ही अलग है । जो हम नही है उसका आभास करना और जो हमारे पास है उसको विकसीत करना दोनों अलग है ।  आजकल कुण्डलिनी विकसीत करने पर जोर नही दिया जाता , बल्कि ध्यान से आभासी दुनिया में कैसे जीया जा सकता है , इसपर जोर दिया जाता हैं ।

श्रीविद्या साधना में तो साधक को विकसीत किया जाता हैं । कुण्डलिनी का दमन करना और कुण्डलिनी विकास करना दोनों अलग बाते है ।

( हमारे वेबसाइट के ऊपर के लेख पढ़िए जिससे कि आपको और अभ्यास हो । )

कलियुग के एक पर्व की समाप्ती…..
कुछ लोगो के पूछने पर थोड़ा और विस्तार से ये बात रहा हूँ। कलियुग के पहला प्रहर का एक पर्व समाप्त हो चुका हे । और दूसरा पर्व शुरू होने में ४३२ साल अंदाजे से लगेंगे। फिलहाल अभी कलियुग पूरी तरह से रुक गया है । यही जो सन्धि काल हे । जो कलियुग दूसरे पर्व में लेके जायेगा , उसके लिए क्लीनिंग की जरूरत हे । दूसरे पर्व की स्तिथी अलग होगी ।
उस स्तिथी में जाने के लिए प्रकॄति को अपना खुद का परिवर्तन आवश्यक होता है । प्रकृति एकेले ही पूरा परिवर्तन नही कर सकती। इसलिए जो जो देवी देवता , दसमहाविद्याए , श्रीललिता की अनेक शक्ति देवतां देवियाँ इनके शक्ति की जरूरत पड़ेंगी ।

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