SriVidya: Saundrya Lahiri – Hiranyagarbh 1

SriVidya: Saundrya Lahiri – Hiranyagarbh 1

श्रीविद्या अंतर्गत सौंदर्यलाहिरी ” हिरण्यगर्भ ” ◆
     भाग : १
      श्रीविद्या अंतर्गत सौंदर्यलाहिरी के विषयों में आज हिरण्यगर्भ का विषय ले रहे हैं ।
      आपने कभी सुना होगा की , हिरण्यगर्भाम् हरिणीं सुवर्ण रजस्त्रम …… यह श्लोक प्रसिद्ध हैं ।
      पर हिरण्यगर्भ क्या है ?
      अगर श्रीविद्या साधक को इसकी मूल समझ आए तो वह अपनी साधना ही वही छोड़ देंगा । क्योंकि , हमारे सूर्यमण्डल जैसे लाखों सूर्यमण्डल है , जिनका एक लोक बनता है । ऐसे चौदह लोको का एक भुवन है , ओर ऐसे न जाने कितने भुवन है । मतलब सूर्यमण्डल ही अरोबो है ।
      मतलब , आप श्रीविद्या साधना कर रहे हैं फिर आपका सङ्कल्प कितना बड़ा और कितना सूक्ष्म होना चाहिए , यह कभी सोचा करे । इसलिए कहा है कि श्रीविद्या साधना गुरु के साथ रहकर , रूबरू होकर लेनी चाहिए ।
      हिरण्यगर्भ को समझने के लिए कुण्डलिनी किसी काम की नही , वहां तक जाने के लिए कुण्डलिनी का सहस्रार एक ठहराव है और साधन है , जहाँ आत्मा हिरण्यगर्भ की ओर प्रयाण करने निकलती , वह ये कुण्डलिनी बदल जाती है , क्योंकि सूर्यमण्डल क्रॉस करने पर आपकी आत्मा को दूसरे सॉफ्टवेयर की मदत लगेंगी । कुण्डलिनी सिर्फ इस ब्रम्हांड का सॉफ्टवेयर है ।
     विश्व गर्भ के मूल सङ्कल्प को जानना , इतना आसान नही । उसके लिए पहले श्रीविद्या साधक को अपनी खुदकी जड़ संकल्पनाएं तोड़नी होगी । पहले तो विश्व कोनसा ?…..  जो हमारा एक सूर्यमण्डल है और उसकी उत्तपत्ति हम ॐ से होती है , ऐसा कहते हैं । क्या उसे विश्व कहेंगे ?
      ऐसे हर समय , यूनिवर्सल काल की बिग बैंग की मशीन में न जाने कितने सारे सूर्यमण्डल डिस्ट्रॉय हो जाते हैं । और कितने सारे नए निर्माण हो जाते हैं । जिनकी कोई गिनती नही ।
     अब यह परिणाम का ज्ञान नासा ने भी माना है और संशोधन किया है , उनके अंतरिक्ष में जो हाय फ्रिकवेंसी रेडिओ जो है उनोने 10-12 साल पहले ही बिग बैंग की अरबो अरबो प्रकाश वर्ष दूर से निकली अत्यंत सूक्ष्म आवाज को सुना है । 2009 की अखबारों में इसका इन्फॉर्मेशन आया था । ये आवाज आप अपनी नॉर्मल कान से सुन नही सकते , क्योंकि मनुष्य की नॉर्मल आवाज के 1अरब भाग कीजिए , जो 1अरब वा अंश को उतनी सूक्ष्म वो आवाज है ।
      उसके लिए मनुष्य की अतिंद्रिय शक्ति स्ट्रॉन्ग चाहिए । अपने सूक्ष्म – कारण – महाकारण शरीर बहुत स्ट्रॉन्ग करके हायर फ्रिकवेंसी में लेकर जाना होता है ।
      नासा ने यह भी कहा है कि जो बिग बैंग की सूक्ष्म आवाज इस सूर्यमण्डल में चली आई , वो बिना किसी चीज से टकराए यहां तक आई कैसे ? क्योंकि आवाज का कंपन होने के लिए अंतरिक्ष में पत्थर धूलिकण चाहिए , वेसा तो कुछ नही । और ये आवाज की क्षमता इतनी है कि यह किसी ग्रह अथवा दूसरी सृष्टि का निर्माण भी कर सके ।
     अब आप ही सोचिए , आपको कहा तक जाना है ?
नासा ने इतना सब बता दिया । और आजके कुछ गुरु लोग श्रीविद्या में सिर्फ मेडिटेशन करना , पंचदशी का जाप करना , और मानसिक पॉजिटिव रहना , हीलिंग करना ही सीखा रहे है । लोग भी मूर्ख बनकर हजारो रुपये खर्च करते है श्रीविद्या साधना पर। और पिछड़ेपन के अलावा कुछ नही मिलता । श्रीविद्या का मुख्य नॉलेज ओर आपकी सङ्कल्प शक्ति कैसे बड़ी करनी है , समझाया ही नही । अगर आप श्रीविद्या साधना कर रहे हैं , तो अद्वैतता का end ही हिरण्यगर्भ है । और ऐसे हिरण्यगर्भ के अंदर जैसे अरबो अरबो सूर्यमण्डल है , वेसे उनिको खत्म करने वाली कई सारे बिग बैंग मशीन भी है ।
      हिरण्यगर्भ को समझने के लिए शिव को , और उससे परे मूल परमशिव को समझो।
    दिव्यो ह्यमूर्त: पुरुष सबाह्य:भ्यन्तरोह्यज:।
    अप्राणो ह्यमना: शुभरौ ह्यक्षरात्परत: पर: ।।२।।
    एतसम्माज्जयते प्राणों मन: सर्वेन्द्रियानीच ।
    खं वायु ज्योर्तिराप: पृथ्वी विश्वस्य धारिणी ।। ३ ।।
     ……… मंडूक उपनिषद का यह श्लोक है । इसके श्लोक में एक अर्थ है , वो अक्षर पुरुष जो अव्यक्त है ओर अव्यक्त – प्रकृति से परे है अतिसूक्ष्म है । वह प्राण और मन रहित सूक्ष्म है । इस विषय मे आपको गीता का तत्वज्ञान पढ़ना चाहिए । जो आप यूनिवर्स , ब्रम्हविद्या , ब्रम्हांड , ब्रम्ह ब्रम्ह करते है पर आप ब्रम्ह कोनसा मानेंगे ? ऊपरी श्लोक में अक्षर ब्रम्ह कहा है और गीता क्षर ब्रम्ह – अक्षर ब्रम्ह ये दो ब्रम्ह कहती है । फिर कोनसे ब्रम्ह की ओर जांएगे ?
          श्रीविद्या साधक को यह पूरी संकल्पना स्पष्ट करके लेनी चाहिए । ये संकल्पना स्पष्ट होगा तभी हिरण्यगर्भ सूत्र समझेंगा ।
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेकासीत ।
स दाधार पृथ्वीं ध्यामुतेमां कस्मै देवायहविषा विधेम ॥
य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्यदेवाः ।
यस्य छायामृतं यस्य मर्त्युः कस्मै देवायहविषा विधेम ॥
    …….. यह ऋग्वेद का सूत्र है । हमारी ईस धरती रूपी ‘सृष्टि के आदिकाल में न सत् था न असत्, न वायु थी न आकाश, न मृत्यु थी न अमरता, न रात थी न दिन, उस समय केवल वही था, जो वायुरहित स्थिति में भी अपनी शक्ति से सांस ले रहा था। उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।’ ‘ब्रह्म वह है जिसमें से संपूर्ण सृष्टि और आत्माओं की उत्पत्ति हुई है या जिसमें से ये फूट पड़े हैं। विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश का कारण ब्रह्म है।’  …. यह ऊपरी सूत्र का अर्थ है ।
      प्रारंभ में ईश्वर (ब्रह्म) ने सर्जक के रूप में स्वयं को अभिव्यक्त किया- ‘हिरण्य गर्भ: समवर्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसित।।’ अर्थात हिरण्यगर्भ यानी सुनहरा गर्भ, जिसके अंदर धरती, सूरज, चांद-सितारे, आकाशगंगाएं, ब्रह्मांडों के गोलक समाए थे और जिसे बाहर से 10 तरह के गुणों ने घेर रखा था, एक दिन वायु ने इसे तोड़ दिया। -हिरण्यगर्भ सूक्त (ऋग्वेद 10.121), वायुपुराण।
     वेद …… हिरण्यगर्भ रूप को पृथिवी और द्युलोक का आधार स्वीकार करते हैं- यह हिरण्यगर्भ रूप ही ‘आप:’ के मध्य से जन्म लेता है। हिरण्यगर्भ से ही ‘हिरण्य पुरुष’ का जन्म हुआ।
    ब्रह्मांड का मूलक्रम- अनंत से महत्, महत् से अहंकार, अहंकार से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई। अनंत जिसे आत्मा कहते और जिसे ब्रह्म भी कहते हैं। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन, बुद्धि (महत्) और अहंकार ये प्रकृति के 8 तत्व हैं।
    यह ब्रह्मांड अंडाकार है।
    यह ब्रह्मांड जल या बर्फ और उसके बादलों से घिरा हुआ है। इससे जल से भी 10 ‍गुना ज्यादा यह अग्नि तत्व से ‍घिरा हुआ है और इससे भी 10 गुना ज्यादा यह वायु से घिरा हुआ माना गया है।
    वायु से 10 गुना ज्यादा यह आकाश से घिरा हुआ है और यह आकाश जहां तक प्रकाशित होता है, वहां से यह 10 गुना ज्यादा तामस अंधकार से घिरा हुआ है और यह तामस अंधकार भी अपने से 10 गुना ज्यादा महत् से घिरा हुआ है और महत् उस एक असीमित, अपरिमेय और अनंत से घिरा है।
    उस अनंत से ही पूर्ण की उत्पत्ति होती है और उसी से उसका पालन होता है और अंतत: यह ब्रह्मांड उस अनंत में ही लीन हो जाता है।
   प्रकृति का ब्रह्म में लय (लीन) हो जाना ही प्रलय है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड ही प्रकृति कही गई है। इसे ही शक्ति कहते हैं।
     पढ़ने को यह सब उलझा हुआ लगेंगा । ओर श्रीविद्या साधना में इसे गुरु ठीक से समझाता है । जैसे कि पहले ही कहा है , की ब्रम्ह कोनसा है ? और क्यों बना है ? …. जो श्रीकृष्ण ने क्षर ब्रम्ह और अक्षर ब्रम्ह दो बताए है । अगर ब्रम्ह एक है तो श्रीकृष्ण ने दो क्यों कहे । कुछ तो कारण होगा ।
     श्रीकृष्ण ने महाभारत से पहले श्रीविद्या साधना की दीक्षा ली थी । अपनी साधना से वो महाशून्य तक गए थे । वही पर आदिशक्ति से अनुमति लेकर गीता के ज्ञान को धरती में लाया । गीता ……  चारो वेद , अठरह पुराण , सभी शास्त्रों का निचोड़ है , और कृष्ण से इसमे क्लियर कर दिया है । समझने वाले और समझाने वालो की कमी है ।
      महापुरुषों ने इतना अच्छा ज्ञान आजके मनुष्य को देकर रखा है । फिर लोग गलत साधनाओ में मन लगाते हैं और भ्रम में जीते हैं ।
      हिरण्यगर्भ को समझने के लिए श्रीविद्या साधना में कामेश्वर रूप परमशिव और कामेश्वरी स्वरूप ललिता को समझ ले । उनसे निर्माण हुए , पाँच आम्नाय जो परमशिव के पाँच मुख है , जो पाँच सादाख्य कला है उनिको ३६ तत्वों के रूप में समझे ।
हिरण्यगर्भ को समझने के लिए 36 तत्व , पृथ्वी से लेकर परमशिव तक सभी तत्व और उनसे जुड़ी पाच कलाए …. इनको समझ ले ।
      श्रीविद्या में बहुत सारे लोगो मे भ्रम होता है , की वो ध्यान में कुछ अनुभव करते है , सप्तचक्रों के पेटल्स पर पंचदशी का मंत्र जपते है । शरीर में श्रीयंत्र की कल्पना करते हैं । बिना समझके ली हुई ऐसे साधनाओ को सिर्फ भ्रमित कल्पना ही कहते हैं ।
       पहले अपने शरीर को शुद्ध करने की क्रिया आवश्यक है। सासों की प्राणशक्ति को उपरनीचे कर कोई क्रिया करने से शरीर की नाड़ियां शुद्ध होती है । पर श्रीविद्या के लिए उतना ही काफी नही है। ये अनुभव सिर्फ मानो समुंदर से एक बूंद पाणी ही देखा है , जो समुंदर का भी पाणी नही ।
        दसमहाविद्या की मुख्य देवता की यह साधना है । उसके लिए श्रीविद्या साधक के शरीर मे किसी पवित्र आत्मा अथवा पवित्र देवता का आगमन होना जरूरी है । जो आपके बेसिक मेडिटेशन से नही होती । ऐसे हजारो में बैठकर दीक्षाए लेने से नही होती ।
      अपने मन को पॉजिटिव फिलिंग लाकर , सब- कॉन्शियस में जाकर भी यह नही होता । मेडिटेशन से काल्पनिक जगत में जाकर भी यह साध्य न होगा ।
       साधनाओ को सही रूप से लेना सीखिए । गुरु से पहचान बढ़ाकर रूबरू होना सीखे । अपने जड़ बुद्धि वाले संस्कार हटाए । …. इस संस्कार में , कुछ लोगो को अपना एक जड़ और गलत धारणा को निकालना होगा , जैसे कि…  हवा में तैरने से जैसे अनुभव , कमर या हेड से डुलने से जैसे , मेंढक की तरह कूदने जैसे , कुछ लोग चिल्लाते है , कुछ बड़ी बड़ी साँसे लेकर अचानक ध्यान में चले जाते हैं । ……. ये सब कुण्डलिनी के स्टार्ट में ध्यान और प्राणशक्ति की क्रिया में अनुभव आते है पर अगर ये आगे ज्यादा होने लगे फिर उसे कुण्डलिनी का अटक जाना कहते हैं ।
        मतलब गुरु के सान्निध्य में न करणे पर और गलत सलाह के कारण , कुण्डलिनी शरीर मे फस जाती है और वो इरिटेट करती है । आप लोग उसे कुण्डलिनी जागरन समझते हैं । ….. बल्कि वो तो विषय कुछ अलग ही है ।
       इसलिए पहले बेस ठीक चाहिए । नही तो , शिबिरो में पैसे भरकर , गलत साधना और मार्गदर्शन मिलने पर ऐसे जीवनभर भ्रम में रहना पड़ता है ।
      जबतक साधक का शरीर एक पवित्र देवतुल्य बन नही जाता , तबतक श्रीयंत्र का रूप शरीर मे धारण नही होता ।
      हिरण्यगर्भ तक पहुचने के लिए जो श्रीविद्या साधना कर रहे हैं , उसके लिए आपको इन सब ज्ञान की आवश्यकता है । श्रीयंत्र में ही जो आखरी त्रिकोण है , वही ” अ-क-थ ” रूप विश्वयोनि है , जिसे कामकला त्रिकोण भी कहते हैं , उनमें ही द्वदशान्त रूपी कुण्डलिनी है । यही द्वदशान्त आपको समझेंगे तब थोड़ा बहुत थिअरी में हिरण्यगर्भ समझ आएंगे । यह एक लंबा अभ्यास है ।
इसके लिए पहले साधना का बेस सही चाहिए । साधना से उत्पन्न शक्ति ही साधक को आगे का ज्ञान समझाने में मदत करती है ।
      हिन्दू धर्म के अनुसार सबसे पहले हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुआ अर्थात जल का गर्भ। हालांकि इससे पूर्व भी कुछ था, जो शून्य था। सूर्य के प्रकाश के कारण हिरण्यगर्भ बना। इसीलिए हिरण्यगर्भ को स्वर्ण अंडा कहा जाता है। वैज्ञानिक कहते हैं कि प्रकाश संश्लेषण की क्रिया का इसमें सबसे बड़ा योगदान रहा।
     जिस तरह हिरण्यगर्भ से ब्रह्मांड आदि ग्रह-नक्षत्रों की उत्पत्ति हुई उसी तरह अगले हिरण्यगर्भ से धरती पर जीवों की उत्पत्ति हुई, जैसे बीज (गर्भ) से वृक्ष निकला और वृक्षों पर हजारों फल के बीच में पुन: बीज (गर्भ) उत्पन्न हो गया।
     जब धरती ठंडी होने लगी तो उस पर बर्फ और जल का साम्राज्य हो गया। तब धरती पर जल ही जल हो गया। संपूर्ण धरती जल में करोड़ों वर्षों तक डूबी रही। इस जल में ही जीवन की उत्पत्ति हुई। आत्मा ने ही खुद को जल में व्यक्त किया फिर जल में ही जलरूप बना और उस जलरूप ने ही करोड़ों रूप धरे। आत्मा को ब्रह्म स्वरूप कहा गया है।
     ऋग्वेद में आप: (जल) को जीवन उत्पत्ति के मूल क्रियाशील प्रवाह के रूप में व्यक्त किया है, वही हिरण्यगर्भ रूप है। इस हिरण्यगर्भ रूप में ब्रह्म का संकल्प बीज पककर विश्व-रूप बनता है। इसी हिरण्यगर्भ से विराट पुरुष (आत्मा) एवं उसकी इन्द्रियों की उत्पत्ति होती है और उसकी इन्द्रियों से देवताओं का सृजन होता है। यही जीवन का विकास-क्रम है।

 || Sri Matre Namah ||

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