श्रीतिरस्करणी देवी ( श्रीवाराही अंग देवता )


🔻श्रीतिरस्करिणी वाराही अम्मान 🔺

ह्रीं
नमस्ते मित्रों ,
श्रीविद्या पीठम में स्वागत हैं ।
श्रीवाराही नवरात्री में एक नाम हमेशा लिया जाता हैं , क्योंकि इस महाशक्ति का पराक्रम ही वैसा हैं।

श्रीविद्या एक बहुत दीर्घ साधना हैं । हर एक एक देवता का कार्य यहां अलग अलग हैं ।

आज हम वराही नवरात्री के अंतिम दिन पर ” श्रीतिरस्करिणी वाराही “ पर देखेंगे ।

श्रीविद्या अंतर्गत जो भी अनेको विद्याएँ उपविद्याएँ आती हैं , उसका विस्तार अनंत हैं ।
किसी भी विद्या में तत्व का अभ्यास महत्वपूर्ण हैं ।
काफी साधको को विद्या मतलब कोई देवी और उसका मंत्र का जाप करना यही दृष्टिकोण होता हैं।

अगर आप श्रीविद्या साधना यह शब्द प्रयोग लेंगे तो साधको के सामने श्रीयंत्र घर में रखकर पंचदशी मंत्र का जाप करना , इतना सीमित अर्थ ही पता होता हैं । परंतु जहाँ सही गुरु की संगत उस शिष्य को होती हैं वो प्रथम श्रीविद्या साधना इस शब्द का अर्थ ” श्रीललिता को तत्व रूप में समझना ” इसी प्रकार लेंगा । परंतु ये ज्ञान गुरु के संगत बिना संभव नहीं , महाविद्या और श्रीविद्या साधना के लिए लगातार काफी लंबे समय तक गुरु से बातचीत संपर्क जरूरी हैं । सोलह सोलह श्रीयंत्र खरीदकर घरमें रखने से कुछ भी नहीं होता ।

आषाढ़ मास में हमने श्रीवाराही नवरात्री मनाई और अलग अलग अंग उपांग शक्तियों को देखा ।

श्रीविद्या में श्रीवाराही देवी श्रीललिता परमेश्वरी की प्रथम एटेंडेंट शक्ति हैं । बिना वाराही श्रीविद्या अपूर्ण हैं ।

श्रीललिता – भंडासुर के युद्ध में श्रीवाराही के साथ उसकी उपांग देवी तिरस्करणी ने प्रचंड पराक्रम दिखाया था ।

तिरस्करणी शब्द का अर्थ हैं तिरस्कृत करना ,
तिरस्कृत मतलब तिरस्कार करना ।

तिरस्करणी की उतपत्ति कब और कैसे हुई वो कथा भी रोचक हैं ।
ललिता भण्डासुर युद्ध में जब मातंगी नकुलेश्वरी ने करंक आदि पाँचो सेनापति यो को मार दिया था , तब भंडासुर ने ललिता देवी से युद्ध करने के लिए बलाहकमुख नामक सात भाइयों को भेजा था ।
बलाहक , सूचीमुख , फालमुख , विकर्ण , विकटानन , करालायु , करकट ये सातों भाई कीकसा के पुत्र थे ।

हमारे सात चक्र यानी सात लोक हैं और ये सातों असुरों ने भण्डासुर के नेतृत्व में सात लोको को जीता था।

इन सातों भाइयों के अत्यंत घोर घोर आयुध और डरावने वाहन थे।  इसिपर बैठकर वो आक्रमण करते थे । सूर्य के वर  के कारण उनके सामने कोई देवता टिकते नहीं थे ।
इसलिए ललिता का सैन्य शक्तियां थक गई और उनके अस्त्र शस्त्र स्तंभित हो गए । वो उन बलाहक आदी सातों भाइयों का कुछ भी कर नहीं सकी ।

तब श्रीललिता परमेश्वरी की आज्ञा से श्री प्रत्यंगरक्षिणी दंडनाथा और श्रीतिरस्करणी देवी युद्ध में उतरी ।

श्रीतिरस्करणी देवी तमोलिप्तान्ह नामक विमान पर विराजमान थी । तिरस्करणी ने अंध नामक अस्त्र का उपयोग दंडनाथा के आदेश से किया था । सूर्य के वर से शक्तिमान होने के कारण अंध अस्त्र से उस प्रकाश की गति रुक गई । उन असुरों पर अंधेरा छा गया ।

तिरस्करणी देवी किसी भी तेज को शक्ति को तिरस्कृत करने की क्षमता रखती हैं ।

श्रीदत्तात्रेय परंपरा में श्रीविद्या साधना अंतर्गत दंडनाथा वराही साधना बिना पंचदशी दीक्षा होती भी नहीं । जब साधक सही प्रकार से दीक्षा की प्राप्ती करता हैं , तब इन अनेको शक्ति समूहों से परिचित हो जाता हैं ।

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