सिद्धाश्रम का शिक्षाक्रम ( प्रतिकार शिक्षण पद्धति )
ॐ
नमस्ते मित्रों ,
~ श्रीविद्या पीठ ~ में आप सभी साधुओं का स्वागत है ।
Article published by SriVidya Pitham .
🧘 महावतार बाबाजी 🧘 यह नाम काफी लोग जानते ही है । और उनके विषय में काफी सारे किताबें अपने पढ़ी होगी । किताबों में लिखी इन विषयों में क्या उतनी सत्यता दिखाई देती है ? आजकल काफी लोग ” महावतार बाबाजी ” से मिलने का दावा भी करते हैं ।
हमारे लेख का विषय है की 📿 सिद्धाश्रम में शिक्षा क्रम कैसे होता है ?
” महावतार बाबाजी ” इनके गुप्त आश्रम में किस प्रकार से ऋषि मुनियों को शिक्षा दी जाती है ?
उनके अभ्यास करने की पद्धति किस प्रकार से है ?
काफी लोगों को ऐसा लगता है की ” महावतार बाबाजी ” के आश्रम में सिर्फ क्रिया योग , कुंडलिनी जागरण जैसे विषय ही सिखाएं जाता है ?
सब कुछ अधूरा ज्ञान और अधूरी जानकारी ही चल रही है ।
⚧️ श्रीकांड और प्रतिकार शिक्षण पद्धति ⚧️
” महावतार बाबाजी ” के जो गुप्त आश्रम है , उनमें उन्हीं को प्रवेश मिलता है । जिन 🪬 ऋषियों की 100 साल की तपस्या पूर्ण हो चुकी है । वह आश्रम बहुत पवित्र और गुप्त है । वहां पहुंचना सामान्य बात नहीं है । इसलिए ही हजारों वर्ष से यह जगह इंसानों से लुप्त रही । किसी को भी एक साथ 100 वर्ष की आयु मिलती नहीं है । परंतु कोई भी आत्मा उसके पिछले जन्म को पकड़कर 100 वर्ष का पुण्य इकट्ठा करती है । तभी कोई आत्मा यहां पर प्रवेश पाती है । यह एक प्राथमिक प्रक्रिया है प्रवेश पाने की …
सिद्धाश्रम में सृष्टि के ज्ञान के काफी सारे ज्ञानपूर्ण 📚 ग्रंथ उपलब्ध है । प्राथमिक अवस्था में किसी ऋषि का प्रवेश इन आश्रमों में होता है , तब वहीं से ~ प्रतिकार शिक्षण पद्धति ~ शुरू हो जाती है । इस पद्धति में बहुत सारा ज्ञान लेकर छोड़ देना होता है अथवा बहुत सारे ग्रंथ पढ़कर उन्हें छोड़ देना होता है । इसमें से एक ग्रंथ का नाम है श्रीकांड !
🛞 श्रीकांड यह बहुत बड़ी ज्ञान व्यवस्था का अथवा बहुत बड़े अभ्यासक्रम का एक छोटा सा हिस्सा है । जो वहां पर हर किसी को पूर्ण करना पड़ता है और यह हिस्सा बहुत विस्तारित हिस्सा है ।
श्रीकांड इस ग्रंथ में तीन सब पार्ट आते हैं ,
१) श्रीकंठी श्रीकांड २) श्रीमुक्ति श्रीकांड ३) श्रीदात्री श्रीकांड
प्रतिकार शिक्षण पद्धती में , श्रीललिता त्रिपुरसुंदरी का मूल जन्म कैसे हुआ ? इसकी हकीकत क्या है ? जन्म हुआ ही क्यों ? इसका कारण क्या हुआ ? जन्म होते समय वह कैसी थी ? जन्म होने के बाद उसने क्या किया ? अनंत ब्रह्मांडों के स्वामिनी बनने के लिए उसने इतना ज्ञान कहां से प्राप्त किया ? ललिता को उसकी बहनों के साथ बगलामुखी देवी ने कैसे बनाया ? बगलामुखी को उन्हें बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी ? अगर ललित सर्वोच्च शक्ति है तो भंडासुर युद्ध में वह थक कैसे गई ? बगलामुखी धूमावती भुवनेश्वरी इनका एक दूसरे के साथ संबंध कैसे हैं ? और वह संबंध वैसा ही क्यों रखा गया है ? भुवनेश्वरी देवी के पास विश्व का सबसे अधिक अद्वैत ज्ञान क्यों है ?
श्रीललिता का जैसे राज्याभिषेक हुआ वैसे पार्वती लक्ष्मी सरस्वती का राज्याभिषेक हुआ था क्या ? अगर हुआ था तो उनकी प्रक्रिया कैसी थी ? उसकी जरूरत क्यों पड़ी ?
जब सिद्धाश्रम में कोई भी ऋषि प्राथमिक अवस्था में आता है। तब कोई ना कोई कुछ ना कुछ सीख कर ही आता है । इस सिख में पूर्ण शुद्ध बुद्धि अथवा शुद्ध ज्ञान नहीं होता । इसलिए अशुद्ध बुद्धि अथवा अशुद्ध ज्ञान निकालना बहुत जरूरी है । यही कार्य प्रतिकार शिक्षण पद्धति में सिद्धाश्रम में किया जाता है ।
अगर लक्ष्मी है , तो ऐसा कौनसा सिंहासन है ? जिसके कारण वह धन की देवी कही गई है ? किसी भी ब्रह्मांड में लक्ष्मी की स्थापना कैसे होती है ? लक्ष्मी को ही धन की देवी क्यों बनाया गया ? सरस्वती को भी धन की देवी बनाया जा सकता था ? आप लक्ष्मी का रूप देखेंगे तो उनके पास हाथी और एक उल्लू होता है । तो वह हाथी कहां से आया ? वह भी किसका बच्चा होगा । तो क्या ? उस हाथी के माता-पिता श्रीललिता त्रिपुरसुंदरी के साम्राज्य में रहते हैं ?कौन से विधि से वह हाथी लक्ष्मी को दिया गया ? वह लक्ष्मी के लिए क्या करता है ? क्या आपने इस तरह से सोच है क्या ? उसका मुकुट कैसा है ? उसके मुकुट के विधि क्या है ? तीनों देवियों के मुकुट में क्या अंतर होते हैं ?
आपको शक्ति दे दी गई है परंतु शक्ति चलाने के लिए अधिकार ही नहीं दिया है।
राज्याभिषेक एक ऐसी पद्धति होती है , जिसमें शक्ति चलाने का अधिकार दिया जाता है ।
अब सरस्वती देवी है , तो उसकी वीणा क्या देवी मातंगी ने उसे दी है ? अगर नहीं तो वह वीणा सरस्वती को किसने दी ? कोई भी देवी जो होती है वह सिर्फ मनुष्य के ऊपर काम नहीं करती । उसका काम प्राणी पशु पक्षी इन समाज में भी होता है । इन सबको ध्यान में रखकर ही शक्तियां दी जाती है । वीणा को कितने तार होते हैं? उतने ही तार क्यों होते हैं ? वह तार सही जगह पर जोड़ना क्यों जरूरी है ? उस तार को कितना खींचना होता है ? तार की खिंचाव से अलग-अलग सुर निर्माण होते हैं , तो हर सुर से कौनसी विद्या निर्माण होती है ? यह एक सूत्र है । इनका अभ्यास प्रतिकार शिक्षण पद्धति में होता है ।
हर देवी एक मुद्रा में बैठी रहती है । तो उसे वह मुद्रा किसने दी ? क्यों दी ? उसे मुद्रा से क्या होता है ?
🛞 श्रीविद्या साधना सिर्फ ललिता – राजराजेश्वरी – महागणपति – बाला त्रिपुरासुंदरी को समझना ही नहीं है । उससे पूर्व काफी सारा प्राथमिक ज्ञान देना बहुत जरूरी है । श्रीविद्या सिर्फ पूजा पाठ की पद्धति नहीं है ।
श्रीविद्या इन्हीं सभी सूत्रों का अभ्यास है ।
आपका प्राथमिक ज्ञान ही कच्चा है तो आप आगे का ज्ञान कैसे उठा पाएंगे ?
इसलिए जितने भी बड़े पवित्र आश्रम होते हैं । उसमें बहुत यह सारे विभाग होते हैं , जहां पर प्राथमिक अवस्था में आने वाले ऋषियों ने जो ज्ञान पहले से लिया है । उस ज्ञान को और शुद्ध करने के लिए उच्च गुरु वही मार्गदर्शन करते हैं ।
उसमें से अशुद्ध ज्ञान , जिसे ” मानवीय बुद्धि के ब्रह्म ” हम कह सकते हैं , उसे निकाला जाता है । यह एक लंबी प्रक्रिया है ।
” महावतार बाबाजी ” के आश्रम में वही ऋषि प्रवेश कर सकता है , जिसकी आगे बढ़कर ध्यान में रहने की अवस्था ५००% हो । मानसिक और शारीरिक एकाग्रता की तीव्र परीक्षा वहां पर ली जाती है । अब जहां योग पद्धति के द्वारा ऋषि मुनि सिद्धाश्रम के प्राथमिक विभाग में प्रवेश करते हैं। तो उनके भी ध्यान – योग पद्धति – कुंडलिनी चक्र इनसे संबंधित अशुद्ध बुद्धि का निराकरण किया जाता है । जब इन्हें सीख कर यह ऋषि आगे बढ़ते हैं तब उन्हें ब्रह्मतत्व योग सिखाया जाता है । इस योग में नाभि से ध्वनि आती है ।
अब यहां बात हुई , जिन्होंने पहले से ही साधना ही की है और उसके पुण्य के ऊपर उन्होंने सिद्धाश्रम में प्रवेश प्राप्त किया । परंतु ऐसे भी आत्माएं होती है , जिन्होंने अपने जीवन में कभी भगवान का नाम ही नहीं लिया है , कोई पूजा पाठ नहीं किया है तो ऐसी आत्माओं को कैसे प्रवेश मिलेगा ? उनके प्रवेश प्रक्रिया कैसे होती है? उनका चयन कैसे किया जाता है ? ऐसी अवस्था में कोई भी सामान्य मनुष्य जिसने अपने जीवन में काफी सारा पुण्य कमाया है , यह पुण्य उसने भौतिक जीवन में बहुत लोगों की मदद करके अच्छे कार्य करके कमाया है । तो ऐसे व्यक्ति सीधे स्वर्ग में जाते हैं । स्वर्ग का मतलब सारे सुख का उपभोग, इतना ही नहीं है। वहां पर भी अभ्यास की प्रक्रिया और ज्ञान देने वाले गुरु तैयार रहते हैं । स्वर्ग में पहुंची आत्मा ने वही आगे का ज्ञान लिया , जैसे कि स्वर्ग का मतलब कौन से सुख की असल व्याख्या है ? वह क्यों दिया जाता है? वहां आत्माएं कैसी आती है ? उनका क्या होता है ? अगर आपने स्वर्ग की इस परिभाषा का ज्ञान लिया और आगे ” महास्वर्ग ” है उसका आपको नियम चाहिए तो वह भी आपको वहां दिया जाता है । परंतु यह क्रिया इतनी आसान नहीं है स्वर्ग के सुख जो होते हैं वह आत्माओं को अपने आगोश में ओढ़ लेते हैं । इन सभी क्रिया में व्यक्ति के पीछे जो बचाकूचा कर्म भी है , उसका भी परीक्षालन करना पड़ता है । मृत्यु के बाद भी आत्मा की सी घर की कुल – कुलाचार – पितृदोष ‘ से छुटकारा नहीं होता । क्योंकि जीवित अवस्था में उसे व्यक्ति ने इन सब का कोई भी कार्य किया नहीं रहता है । तो यह एक बहुत बड़ी पेचीदा विषय है । इसका थोड़ा सा अंदाजन ज्ञान आपको यहां पर हमने दिया है ।
इन सभी प्रक्रिया में आत्मा का पिछले जन्म का कार्य , पिछले शरीर का कार्य , जिस कुल में जन्म लिया है , जिस ब्रह्मांड में जन्म लिया है । उन देवी देवताओं का मान पूर्ण करना आवश्यक होता है ।
अगर आपने अपने ही घर के व्यक्ति को भूखे रखा और आप बाहरी लोगों को खाना देते रहे तो कैसे होगा ?
उल्टा घर के लोगों का शाप आपको लगता रहेगा और आप सोचते रहेंगे कि मैं जन सेवा कर रहा हूं और मुझे पुण्य मिल रहा है ।
सामान्यतः लोग इसी प्राथमिक विषय को समझते नहीं है और बाहरी जगह से अलग-अलग साधना लेकर फस जाते हैं ।
सिद्धाश्रम के इसी ” प्रतिकार शिक्षणपद्धति ” के विभाग में ” जैन बुद्धिस्ट सिख इस्लाम ईसाई धर्म ” से भी आने वाले गुरु होते हैं । परंतु उनकी प्रवेश प्रक्रिया थोड़ी अलग पद्धति से होती है । तो लेख बहुत लंबा हो जाएगा इसके कारण इस लेखक को यहीं पर पूर्णविराम देते हैं । महावतार बाबाजी और उनके सिद्धाश्रम उनके विषय पर काफी सारे भ्रम चर्चित हैं । इसलिए एक ज्ञानपूर्ण लेख आपके सामने प्रस्तुत किया है ।
धन्यवाद ।
Article published by SriVidya Pitham .
Special thanks to Shri Mahavatar Babaji and
Shri Swami Samarth Maharaj for this divine guidance .
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