श्रीबाला त्रिपुरसुंदरी

श्रीबाला त्रिपुरसुंदरी

                 ● श्रीबाला परमेश्वरी ●

   ” भंडासुर वधोदयुक्ता बाला विक्रम नंदिता “

नमस्ते मित्रों , श्रीविद्या पीठम में स्वागत हैं ।
अनेको लोग तीन अक्षरों वाला मंत्र जाप करते हैं , जिसे बाला देवी का मंत्र कहा जाता हैं । परंतु , लाखो तक जाप करने पर भी उस शक्तिका आविर्भाव नहीं होता । क्योंकि , गुरु द्वारा सिर्फ मंत्र ग्रहण करने मात्र को ही दीक्षा नहीं कही जाती । जबतक उस महाशक्ति के चैतन्य रूपी प्रकाश रूपी विस्तार को ही नहीं समझ पाएंगे , तब श्रीयंत्र के सामने लाखो मंत्र बोलकर भी क्या होगा ?
उस बालाम्बा का पराक्रम कभी सुनाया नहीं जाता । काफी लोग श्रीविद्या की गलत दीक्षा लेने के कारण श्रीविद्या के मुलत्व के ज्ञान तक पहुच नहीं पाते ।
वही आज आपके सामने थोड़ा अंश ला रहे हैं ।

जब भण्डासुर का दूत श्रीललिता परमेश्वरी के श्रीचक्र निवास में प्रवेश करने लगा , तब श्रीललिता की सेनापती दंडनाथा वाराही देवी ने अपनी परिचारिका सेना द्वारा उसे पकड़वा लिया और अपने सामने हाजिर किया । वाराही ने दूत का संदेश श्रीललिता परमेश्वरी की मंत्रिणी श्रीराजश्यामला देवी को दिया ।

संपूर्ण श्रीचक्र श्रीयंत्र की प्रमुख देवीयों में श्रीवराही और श्रीमातंगी देवी प्रथम है , इसलिए श्रीदत्तात्रेय निर्मित परशुराम कल्पसूत्र की श्रीविद्या साधना में प्रथमतः इन दोनों साधनाओ का उल्लेख हैं ।बिना इस साधना ऊर्जा द्वरा पंचदशी की दीक्षाए नहीं होती ।
जब राजश्यामला देवी ने दूत से उसका परिचय लिया , तो उसने इसकी जानकारी श्रीललिता त्रिपुरसुंदरी को दी और देवी के सामने उसे हाजिर किया । उस दूत ने जब श्रीललिता का सैन्यबल देखा तो , श्रीचक्र में भयानक आवाजे आ रही थी , सारी शक्तियां महान पराक्रमी थी , उस ललिता की पुत्री भी थी जिसका नाम ” बाला ” था । बाला कुमारिका भी हजारो कुमारियों से घिरी थी । आयुध संचलन और युद्धकला में प्रवीण वह बाला देवी बार-बार यही बोल रही थी कि भंड के बेटों को में मारूंगी । उस कुमारी की जो कुमारिका सेना थी वह भी बोल रही थी कि भंडपुत्रो की सेना को चुटकी में हम मसल डालेंगे ।
यही है श्रीबालम्बा परमेश्वरी , नव वर्षीय छोटी कन्या , जो श्रीललिता कि प्रिय बेटी हैं ।

भंडासुर युद्ध में श्रीबाला देवी खुदके रथ पर सवार थी , उनके रथ के सारथी का नाम रथनेत्री था । बाला को ललिता ने काफी समझाया फिर भी वह अपने हट के कारण दौड़ी दौड़ी युद्ध में घुस गई । उसे देख , बाला को संरक्षण देने अश्वरूढा शक्तियां भी आगे बढ़ी । उसके पीछे संम्पतकरी देवी भी रनकोलाहल नामक हाथी को लेकर अनेक करोड़ मातंगी सेनाओं से उसके पीछे चली ।

बाला देवी की सारथी भी उस आकार वाली छोटी कन्या थी ।

उस महान युद्ध में भंडासुर ने जब बाला देवी को देखा तब विन्रमता पूर्वक जलास्त्र मंत्र से अभिमंत्रित बाण बाला के चरणों में फेंका और पौष्पमंत्र से दूसरे बाण द्वारा फूलों की माला बाला के गले में डाल दी , शर से बाला के पैर धोए । युद्ध में यह घटना सबने देखी और सभी आश्चर्य हुए । तभी श्रीबाला देवी ने एक बाण भंडासुर की तरफ छोडा , उस बाण से पाँच शाखा उत्तपन्न हुई और उस दैत्य के सर को स्पर्श कर आशीर्वाद दिया।  देवी का यह प्रसाद पाकर दैत्य भी हर्षित हुआ । यह देखकर श्रीबाला की रथनायिका भी विस्मित हुई ।

श्रीविद्या साधना श्रीबाला त्रिपुरसुंदरी का प्रथम विधान ही दत्तात्रेय द्वारा परशुराम जी को और उनके द्वारा ऋषि सुमेधा को दिया गया था ।
धन्यवाद ।
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