Sri Vidya – From Shiv To Shav (शिव से शव की ओर) 2

Sri Vidya – From Shiv To Shav (शिव से शव की ओर) 2

◆ श्रीविद्या अंतर्गत शिव-शक्ति का भेदन (शिवलिंग) ◆
☘️ शिव से शव की ओर ☘️
भाग : 2

जब श्रीविद्या का संबंध आता है तो इसी ऊपरी वक्तव्य अर्थात पिछला लेख की , और गहराई में समझना जरूरी है।

पहले तो शिव यानी हम किस ‘ शिव तत्व ‘ की साधना कर रहे है ? आध्यत्मिक क्षेत्र में कुण्डलिनी चक्र में शिव है वो अलग है , एक कुण्डलिनी में ही एक चक्र में रुद्र भी है , दूसरे चक्र में सदाशिव भी है , तीसरे चक्र में स्वतः शंकर ची उपस्थित है । तीनो ही शिव माने तो वो अलग कार्य और रूप से क्यों बसे है ….. प्रश्न है ।
वेसे ही , उसके ऊपरी जगत में अलग शिव है , ऐसे शिव-शंकर-रुद्र- सदाशिव-महाकाल-एकलिंग ई एक शिव में कितने सारे अंतर है और उनके कार्य अलग अलग। हमे हर एक का कार्य समझना होगा ।

देवी भागवत पुराण अंतर्गत कथाओं को देख यही अनुमान लगाया जाता है , की अनेक सौरमंडल है और उनके देवता भी अलग है । उसमे भी जो शिव का जन्म दिया है , बाद वह शिव …. विष्णु ब्रम्हा के साथ श्रीललिता परमेश्वरी के मणिद्वीप जाने के निकलते है , फिर उन शिव को अलग अलग ब्रम्हांड में अपने जैसा कोई दिखाई देता है । यानी वो अलग जो है वो भी शिव थे ।

यानी जैसे इस ब्रम्हांड में शिव तत्व है वेसे , अनेक ब्रम्हांडो में भी शिव तत्व है । फिर आप श्रीविद्या साधना में किस शिव तत्व की आराधना करेंगे?

वेसे ही शिव पुराण अंतर्गत रुद्र संहिता ओर वायवीय संहिता का ठीक से अभ्यास करने पर निर्देशित होता है की , उसमे दो शिव का उल्लेख है ।
एक शिव ने अपने से दूसरे शिव का प्रागट्य किया ।

महाकाल संहिता के अंतिम श्लोको में भी स्वतः शिव कहते है , रुद्र की एक दिन-रात में ब्रम्हा की सौ वर्ष की आयु रहती हैं।
उसके बाद ब्रम्हा की भी मृत्यु होती है और नया ब्रम्हा उस पद पर विराजमान होते है।
वेसे ही शिव के एक दिन में पाँच ब्रम्हा उत्पन्न होकर मृत्यु होते हैं। रुद्र का जीवन बारा हजार वर्षों का होता , अंततः वो भी अपने शक्ति में विलीन हो जाते हैं। तो इस विधान से ही सूचित होता है की रुद्र ओर शिव के कार्य अलग है । ओर उनकी भी मृत्यु निच्छित है , मृत्यु यानी वो अपना कार्यकाल खत्म होने पर अपने से ऊपरी शक्ति में विलीन होकर , वहां दूसरा कोई पद पर आता है।

फिर भी सामान्यतः प्रचलित है की यह एक ” शिव ” तत्व ही चला रहे हैं। परन्तु , प्रचलन होना और एक आध्यात्मिक अनुभव पर उस तत्व को महसूस करना दोनों अलग बात है।

श्रीविद्या में अगर बात करे तो , श्रीराजराजेश्वरी यानी कामेश्वरी जो पूर्ण महाशक्ति है वो महाकामेश्वर को आलिंगन देकर बैठी है ।  कुछ श्रीविद्या साधक इस विषय में सोचेंगे कि , अरे ये तो शिव जी ही है ।
पर आप जो समझ रहे है वो शिव यानी महाकामेश्वर नही ।
श्रीविद्या शिबिर में जब श्रीयंत्र का ज्ञान गुरु से लेते हैं । तब गुरु हमे बताते है की , श्रीयंत्र में हमें पाँच शिवयुवती दिखती है जो चार शिवो से मिलन करना चाहती है। पर यह मिलन पूरा नहीं होता । क्योंकि बिंदु में कामेश्वरी सहित कामेश्वर ही पूर्ण शिव है , फिर ये शिवयुवती भी उस तत्व को साधने का प्रयास करती है ।

वेसे तो शिव के जीवनकाल में उनोन्हे एक दिव्य शक्ति को भी प्रगट किया कि जो सती से भी सौ गुना ताक़दवर थी । जिसको कृत्या कहते है । कृत्या के ऊपर कोई बड़ी शक्ति नही । पर श्रीविद्या अंतर्गत ये शिव और महाकामेश्वर कि एकरूपता साधना इतना आसान नही । ( समय आने पर हम कृत्या के विषय मे भी लिखेंगे । )

सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर संहार तक केवल शिव हैं चाहे सगुन रूप में मूर्तिमान रूप में उपासना की जाये या निर्गुण रूप में शिवलिंग की पूजा की जाए | वे केवल जलधारा, दुग्धारा और बिल्वपत्र से ही प्रसन्न होने वाले देव हैं इसलिए भोलेनाथ हैं | फिर भी शिव-सदाशिव-परमशिव को हमे समझना चाहिए । जो सत्य शाश्वत है ।

श्रीविद्या साधना में शिव को आदिगुरु बताया जाता है। …… सत्य भी है। …….. पर जो सत्य रूप से संचलित शिव है उससे पहचान जरूरी है। क्योंकि आदिगुरु की कभी मृत्यु नही होती । इसलिए हमे शिव के सभी रूप को समझकर आगे आगे बढ़ना चाहिए ।
किस शिव की मृत्यु होती है और किस परमसत्ता रूपी शिव की मृत्यु नही होती ? भेद समझो ।

श्रीविद्या साधक की प्रगति क्यों नहीं होती ?
क्योंकि , इसी सत्य परमशिव को समझने में हम भूल करते हैं। हमे ज्ञान और साधना का जोड़ बनाके अपने मन को एक ऊंचाई देनी है , …… गुरु से साधना का मार्ग अगर सही नही मिला , फिर उसका तेज-बल कैसे तयार होगा? क्योंकि , ‘ ज्ञान ‘ को पचाने की ताकत ” साधना का बल ” रखती है।

इसलिए , साधक को अपने मन-बुद्धि का विस्तार बड़ा करना होगा ।  ( एक साधक की रोज की आमदनी पाँचसौ रुपये है , वो महीने की सोच नही सकता । दूसरे साधक की आमदनी महीना तीस हजार है , वो साल की सोच नही सकता ।  तीसरे साधक की आमदनी साल की चार लाख है , वो उसके आगे की नही सोचता ।  पर एक बड़ा बिजनेसमैन आगे दस साल की सोच रख करोड़ो-अरोबो की आमदनी रखता है । …….  ये है विस्तार )

श्रीविद्या साधक अपनी निजी जीवन के घटनाक्रम को ही कम आँखता है , फिर ऊपरी जगत का पथ कितना बड़ा है ।
इसलिए शिव तत्व को समझने के लिए अपने वास्तविक जीवन के उद्दीष्टो का विस्तार बढ़ाए ।

आपकी श्रीविद्या की साधना का मार्ग गलत होगा तो साधक का असल ध्येय साध्य नही होगा ।

देखा जाए तो सभी के शरीर मे एकही परमात्मा वास कर रहा है। पर यह सब बोलने की बाते है और सुनने में सिर्फ अच्छा लगता है।  पर , यह भाव अपने अंदर से आना चाहिए ।
ऐसा क्यों ?
क्योंकि श्रीविद्या जैसी उच्चतम साधना किसी प्रचलन पर नही चलती। जबतक साधक को उस अवस्था का आभास नही होता तबतक साधक को गुरु के सान्निध्य में बैठकर यह गुप्त ज्ञान अर्जित करना चाहिए।
( श्रीविद्या साधक को एक डायरी रखनी चाहिए , महत्वपूर्ण विषयों को उसमे लिखकर , उसपर चिंतन करना चाहिए । अपने आपको आध्यत्मिक विज्ञानवादी बनाने के लिए जरूरी है। )

To be continued …

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