Sri Vidya – Sadashiv Tatva (सदाशिव तत्व)1

Sri Vidya – Sadashiv Tatva (सदाशिव तत्व)1

◆ श्रीविद्या अंतर्गत सदाशिव तत्व का अभ्यास ◆
भाग : १
आज हम एक नए विशेष विषय में जानेंगे ।
पँचप्रेत पँचब्रम्ह के ऊपर आसन स्थित श्रीललिता परमेश्वरी , ” सदाशिव तत्व ” के ऊपर विराजमान है । उसे सदाख्य कला भी कहते हैं ।

जब श्रीललिता परमेश्वरी का अवतार हुआ तब अनेको सूर्यमण्डल के ब्रम्हा विष्णु महेश ओर उनके साथ अनेक देवता उपस्थित थे ।
जब श्रीललिता ने बैठने के लिए आसान मांगा , तब सभी देवताओं ने अपनी अपनी शक्ति से अलग अलग तरह के दिव्य आसन बनाए , पर सभी आसन टूट गए ।

देवताओ के समझ मे ये नही आया कि सभी आसान टूट कैसे जाते हैं ।
श्रीललिता की महाशक्ति से वो भलीभाँति परिचित थे भी ओर नही भी ।
अब देवी को आसन कैसे दिया जाए ? तभी ब्रम्हा – विष्णु – रुद्र – ईश्वर ये चारों तत्वों ने आसन का रूप लिया ओर उसपर सदाशिव लेट गए , …… सदाशिव तत्व के पेट पर श्रीललिता विराजमान हुई ओर वह आसन स्थिर हुआ ।

श्रीविद्या साधना में पंचदशी मंत्र की दीक्षा तक पहुचने पर इन सभी तत्वों का अभ्यास जरूरी है । श्रीविद्या दीक्षा देने वाले गुरु के सान्निध्य में यह सब एक एक तत्व को सिखा जाता है।

कुछ जगहों पर इन सबका ज्ञान न देते हुए , सीधे श्रीविद्या के पंचदशी का जाप देकर घर मे जप करने को कहते हैं । ओर उसे ही वो साधना समझ बैठते हैं । अपितु यह एक भ्रम है , जहाँ व्यक्ति को मंत्र का जाप करना ही साधना प्रतीत होता है । बहुत साल होने पर भी ऐसे साधको में थोडासा भी फर्क नही पड़ता ।

श्रीविद्या गुरु अपने साधक को हर समय अपने शिष्य को जिज्ञासु बनाता है ।
जबतक साधक जिज्ञासु बनेगा नही , तबतक उसको एक एक विषय के बारे में पता नहीं चलेगा ।

हमारे पहले एक लेख में शिव और परमशिव का भेद समझा था । अगर श्रीविद्या साधना समझनी हो तो साधक के मन के अर्थात सृष्टि के बहुत सारे भेद/राज खुलके सामने आने चाहिए ।

सिर्फ शिव शिव करने से अथवा शिव ही ब्रम्ह है , ऐसे मानने से यह नही होता । ऐसा कहना मतलब मन को तसल्ली देना की …… में जिस शिव को पूज रहा हु वही सत्य है ।

मूल परमशिव ने सृष्टि विस्तार में अपने आपको कई तत्व में विभाजित कर दिया है ।

उसमे से एक ” सदाशिव तत्व ” है।

महाकाली अपने होश भूलकर तांडव करने लगती हैं । उसका तांडव देख सभी देवता भयभीत होते हैं , अब उनको कैसे रोका जाए ? अगर काली का रुद्र रूप शांत नहीं हुआ फिर विश्व का गति बिगड़ जाएंगी ।
तभी शिव अपना रूप बदलकर सदाशिव तत्व में आकर काली के पैर के नीचे आते है , अपने पति को देखकर काली अपना रौद्र रूप शांत करती है।

वही सदाशिव तत्व को श्रीविद्या में सादाख्य कला भी कहते हैं।

जब सृष्टि नहीं होती ,तो केवल एक ही तत्व का अस्तित्व होता है |वह है सदाशिव । एक स्थिर तत्व ।

इस पृथ्वी पर कितने सारे समुदाय करोड़ो सालो में होकर गए हैं , कितने समुदाय नष्ट हो गए और कितने नए बन गए । आजका इतिहास भी बहुत समुदायों ओर साम्राज्यो को नही जानता ।

उनमें कैसा ईश्वर था ?
हमें श्रीविद्या साधना से विश्व की उस शक्ति को समझना हो तो , अपने मन का विस्तार भी बढ़ाना होगा ।

मनोवैज्ञानिक कहते है कि यह अतीत कभी नहीं था। यह अतीत तो हर व्‍यक्‍ति के गहन में छिपी गर्भ की स्‍मृति है। वह अतीत असल में गर्भ में था।

गर्भ में बच्‍चा ऐसे ही था जैसे शेषनाग पर लेटे विष्‍णु। हिन्‍दू मानते है कि विष्‍णु अपनी नाग-शय्या पर लेटे हुए आनंद के सागर में तैर रहे है।

गर्भ में बच्‍चा ऐसे ही होता है। बच्‍चा भी तैरता है। मां का गर्भ भी सागर के जैसा है। और तुम हैरान होओगे। कि मां के गर्भ में बच्‍चा जिस जल में तैरता है उसके सभी लवण वही होते है। जो सागर के जल में होते है—वही लवण, वही अनुपात। वह सागर का ही सुखद जल होता है।

और गर्भ में सदा बच्‍चे के लिए उचित तापमान रहता है।
मां चाहे सर्दी से कंप रही हो, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता, बच्‍चे के लिए गर्भ में सदा एक सा तापमान रहता है। वह ऊषण रहता है। आनंद से तैरता रहता है। कोई चिंता, कोई दुःख उसे नहीं होता।
मां उसके लिए जैसे होती ही नहीं। वह अकेला होता है। उसे मां का भी पता नहीं होता। मां उसके लिए जैसे होती ही नहीं।

यह संस्‍कार, यह छाप तुम्‍हारे साथ रहती है।

यही मूल सत्‍य है। समाज में प्रवेश करने से पहले तुम ऐसे ही थे। और मरकर जब तुम समाज से बाहर जाओगे तब भी यही सत्‍य होगा।
तुम फिर अकेले हो जाओगे। और एकाकीपन के इन दो छोरों के बीच तुम्‍हारा जीवन तमाम घटनाओं से भरा होता है।
लेकिन वे सब घटनाएं सांयोगिक है।
गहरे में तुम अकेले ही रहते हो। क्‍योंकि वहीं मूल सत्‍य है।
उस एकांत के चारों तरफ बहुत कुछ घटता है। तुम्‍हारा विवाह होता है। तुम दो हो जाते हो,फिर तुम्‍हारे बच्‍चे हो जाते है। और तुम कई हो जाते हो। सब कुछ होता रहता है।
लेकिन केवल परिधि पर, गहन अंतरतम अकेला ही रहता है।
वह तुम्‍हारी वास्‍तविकता है।
तुम उसे अपनी आत्‍मा कह सकते हो।
अपना सार कह सकते हो।

शिव के सदाशिव तत्व को समझने के लिए आज इतना काफी है ।
( फ़ोटो में सदाशिव तत्व देखिए )

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