Sri Vidya – Sadashiv Tatva (सदाशिव तत्व) 3

Sri Vidya – Sadashiv Tatva (सदाशिव तत्व) 3

◆ श्रीविद्या अंतर्गत सदाशिव तत्व का अभ्यास ◆
भाग : ३

सदाशिव तत्व को समझने के लिए , ओशो का एक वक्तव्य ले रहा हु । अपने जीवन को इस जगह पर रखकर देखिए , फिर पवित्र अध्यात्मिक ता महसूस होगी ।
मन बहुत सूक्ष्‍म है।
तुम एक पहाड़ी पर हो जहां और कोई नहीं है। लेकिन नीचे कहीं,तुम्‍हें कोई झोपड़ी दिखाई दे जाए तो तुम उस झोपड़ी से बातें करने लगोंगे,उससे संबंध जोड़ लोगे— यहाँ समाज आ गया।
तुम नहीं जानते कि वहां कौन रहता है। लेकिन कोई रहता है, और वही सीमा बन जाती है। तुम सोचने लगते हो, वहां कोन रहता है। रोज तुम्‍हारी नजरें उसे खोजने लगती है। झोंपड़ी मनुष्‍यों की प्रतीक बन जाएगी।

तो सूत्र कहता है: ‘प्राणियों से रहित हो।’

वृक्ष भी न हों, क्‍योंकि जो लोग अकेले होते हो वे वृक्षों से बोलना शुरू कर देते है। उनसे मित्रता कर लेते है, बात-चीत करने लगते है।
तुम उस व्‍यक्‍ति की कठिनाई को नहीं समझ सकते जो अकेला होने के लिए चला गया है वह चाहता है कि कोई उसके पास हो।
तो वह वृक्षों को ही नमस्‍कार करना शुरू कर देगा। और वृक्ष भी प्राणी है, यदि तुम ईमानदार हो तो वे भी जवाब देना शुरू कर देंगे। वहां प्रति संवेदन होगा। तो तुम समाज खड़ा कर सकते हो।

तो इस सूत्र का अर्थ यह हुआ कि किसी स्‍थान पर रहो और सचेत रहो कि कोई दोबारा समाज न खड़ा कर लो।
श्रीविद्या ही माया तत्व से परे होना सिखाती है , ओर इस सदाशिव तत्व से भी परे होना का मार्ग दिखाती हैं ।
पर श्रीविद्या साधक , तुम द्वैत के चालो को नही समझ पाए ओर ब्रम्ह की बात करते हो ।

तुम एक वृक्ष से भी प्रेम करना शुरू कर सकते हो। तुम्‍हें लग सकता है कि वृक्ष प्‍यासा है तो कुछ पानी ले आऊं, तुमने संबंध बनाना शुरू कर दिया।
और संबंध बनाते ही तुम अकेले नहीं रह जाते। इसीलिए इस बात पर जोर है कि ऐसे स्‍थान पर चले जाओ लेकिन यह बात याद रखो कि तुम कोई संबंध नहीं बनाओगे।
संबंध और संबंधों के संसार को पीछे छोड़ जाओ और अकेले ही वहां जाओ।

यही सदाशिव तत्व हैं ।

श्रीविद्या साधना में एक प्रेक्टिकल अंग आता है । गुरु साधना के अंतर्गत कुछ परीक्षाएं लेता है ।
श्रीविद्या सिखाने वाला गुरु अपने शिष्य को साधना में दरम्यान समाज से दूर रहकर , सबसे दूर रहकर अपने मन का चिंतन करने को कहेंगा ।
ये दोनों विषयो के मध्य का बिंदु है ।
एक , जब आप समाज मे थे और दूसरा शरीर – मन आधार से मुक्त हो गया । इनमें तुमारी आत्मा का क्या कहना है ? ये सदाशिव तत्व की समझ है।

जैसे जल में भिगोया गया चना अंकुरित होने की प्रक्रिया में अपनी पूर्व अवस्था से विलक्षण अवस्था को धारण करता है, उसी प्रकार ‘शक्‍तित्व’ का ज्ञानांश के प्राधान्य से होने वाला सृष्‍ट्‍युन्मुख ‘इदंता’ रूप यह प्रथम स्फुरण ही ‘सदाशिव-तत्व’ है।

उपनिषाद कहते है: ‘’एक को जानकर सब जान लिया जाता है।‘’

ये दो आंखें तो सीमित को ही देख सकती है; तीसरी आँख असीम को देखती है। ये दो आंखे तो पदार्थ को ही देख सकती है; तीसरी आँख अपदार्थ को, अध्‍यात्‍म को देखती है। इन दो आंखों से तुम कभी ऊर्जा की प्रतीति नहीं कर सकते , ऊर्जा को नहीं देख सकते, सिर्फ पदार्थ को देख सकते हो। लेकिन तीसरी आँख से स्‍वयं ऊर्जा देखी जाती है।

द्वारों का बंद किया जाना केंद्रित होने का उपाय है। क्‍योंकि एक बार जब चेतना के प्रवाह का बाहर जाना रूक जाता है। वह अपने उदगम पर थिर हो जाती है। और चेतना का यह उदगम ही ” त्रिनेत्र ” है। अगर तुम इस त्रिनेत्र पर केंद्रित हो जाओ तो बहुत चीजें घटित होती है। पहली चीज तो यह पता चलती है कि सारा संसार तुम्‍हारे भीतर है।

स्‍वामी राम कहा करते थे कि सूर्य मेरे भीतर चलता है। तारे मेरे भीतर चलते है, चाँद मेरे भीतर उदित होता है; सारा ब्रह्मांड मेरे भीतर है। जब उन्‍होंने पहली बार यह कहा तो उनके शिष्‍यों कि वे पागल हो गए है। राम तीर्थ के भीतर सितारे कैसे हो सकते है।

वे इसी त्रिनेत्र की बात कर रहे थे। इसी आंतरिक आकाश के संबंध में। जब पहली बार यह आंतरिक आकाश उपलब्‍ध होता है तो यही भाव होता है। जब तुम देखते हो कि सब कुछ तुम्‍हारे भी तर है तब तुम ब्रह्मांड ही हो जाते हो।

त्रिनेत्र तुम्‍हारे भौतिक शरीर का हिस्‍सा नहीं है। वह तुम्‍हारे भौतिक शरीर का अंग नहीं है। तुम्‍हारी आंखों के बीच का स्‍थान तुम्‍हारे शरीर तक ही सीमित नहीं है। वह तो वह अनंत आकाश है जो तुम्‍हारे भीतर प्रवेश कर गया है। और एक बार यह आकाश जान लिया जाए तो तुम फिर वही व्‍यक्‍ति नहीं रहते। जिस क्षण तुमने इस अंतरस्‍थ आकाश को जान लिया उसी क्षण तुमने अमृत को जान लिया तब कोई मृत्‍यु नहीं है।

यही पूर्ण तीनो लेखों में मध्यबिंदु वाली स्थिरता को ही सदाशिव तत्व कहा गया है ।

अगले लेख को समझने के लिए इन तीनो लेखों को ठीक से पढ़े और समझे , तभी अगले लेख में हम सदाशिव तत्व को श्रीविद्या में सादाख्य कला कहते है , उसे जानेंगे ।
इसलिए श्रीविद्या गुरु के साथ रहकर सीखी जाती है , न कि झुंड में रहकर मन्त्र दीक्षा लेकर ।

( पिछले लेख की दो आकृति ओर नीचे दी हई तीसरी आकृति देखिए , सदाशिव तत्व कहा विराजमान हैं । )

 

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